Tuesday, 20 September 2016

इनाम





हिरन का मांसखाते-खाते भेड़ियेके गले मेंहाड़ का एककाँटा अटक गया। 
 
बेचारे का गलासूज आया। वह कुछ खासकता था, कुछ पी सकताथा। तकलीफ केमारे छटपटा रहाथा। भागा फिरताथा-इधर सेउधर, उधर सेइधऱ। चैनथा, आरामथा। इतने मेंउसे एक सारसदिखाई पड़ा-नदीके किनारे। वहघोंघा फोड़कर निगलरहा था।
   
भेड़िया सारस केनजदीक आया। आँखोंमें आँसू भरकरऔर गिड़गिड़ाकर उसनेकहा-''भइया, बड़ीमुसीबत में फँसगया हूँ। गलेमें काँटा अटकगया है, लोतुम उसे निकालदो और मेरीजान बचाओ। पीछेतुम जो भीमाँगोगे, मैं जरूरदूँगा। रहम करोभाई !''
 
सारस का गलालम्बा था, चोंचनुकीली और तेजथी। भेड़िये कीवैसी हालत देखकरउसके दिल कोबड़ी चोट लगीभेड़िये ने मुंहमें अपना लम्बागला डालकर सारसने चट् सेकाँटा निकाल लियाऔर बोला-''भाईसाहब, अब आपमुझे इनाम दीजिए!''
 
सारस की यहबात सुनते हीभेड़िये की आँखेंलाल हो आई, नाराजी के मारेवह उठकर खड़ाहो गया। सारसकी ओर मुंहबढ़ाकर भेडिया दाँत पीसनेलगा और बोला-''इनाम चाहिए! जा भाग, जानबची तो लाखोंपाये ! भेड़िये के मुँहमें अपना सिरडालकर फिर तूउसे सही-सलामतनिकाल ले सका, यह कोई मामूलीइनाम नहीं है।बेटा ! टें टेंमत कर ! भागजा नहीं तोकचूमर निकाल दूँगा।'' 
 
सारस डर केमारे थर-थरकाँपने लगा। भेड़ियेको अब वहक्या जवाब दे, कुछ सूझ हीनहीं रहा था।गरीब मन-ही-मन गुनगुनाउठा-

रोते हों, फिरभी बदमाशों परकरना यकीन। 
 मीठी बातों सेमत होना छलियोंके अधीन। 
करना नहीं यकीन, खलों पर करनानहीं यकीन।।


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