Sunday, 4 September 2016

छत्तीसगढ़ के जंगलों में 'दिल्ली साब' का सपना


हर बैगा आदिवासी बच्चा हो 12 वीं पास

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 200 किमी दूर अचानकमार के जंगलों में दिल्ली के प्रोफेसर प्रभुदत्त खेरा पिछले 33 वर्षों से बैगा आदिवासियों के बच्चों को जिस शिद्दत से पढ़ा रहे हैं, उसे देख आप भी उनके कायल हो जायेंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर पद से सेवानिवृत 80 वर्षीय खेरा जी 12 वीं तक का स्कूल चलाते हैं। उनका मकसद हर बैगा बच्चे को 12 वीं पास कराना है। 'दिल्ली साब' के नाम से पहचाने जाने वाले खेरा कहते हैं मैं सेवा से मिलने वाली संतुष्टि को महसूस करने यहां आया। दो-तीन साल तो यही समझ नहीं आया कि क्या करूं? फिर एक दिन दस साल की बच्ची को फटे कपड़े छिपाते देखा। बस मुझे काम का मकसद मिल गया। बाजार से सुई-धागा खरीद लाया, जिसके फटे कपड़े देखता सिल देता।'दिल्ली साब' ने शादी नहीं की। अपनी पेंशन भी बच्चों की शिक्षा पर खर्चते हैं। कई बार दोस्त व परिचित भी मदद करते हैं। उनका मत है, विचार और जीवनशैली में रत्ती भर भी फर्क नहीं होना चाहिए। वे बताते हैं, बैगा बच्चे जब कुछ नया सीखते हैं तो खूब आनंद मिलता है। इस आनंद के आगे दिल्ली और बाकी दुनिया नजर नहीं आती सात साल में 27 से ज्यादा बच्चे यहां से पढ़कर 12 वीं पास कर चुके हैं।

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