एक शहर से लगे हुए गांव के पास एक खतरनाक मोड़ था। उसी गांव में हरिराम अपने परिवार के साथ रहता था। वह दूसरे के खेतों में मजदूरी करके किसी तरह अपना और अपने परिवार का जीवन यापन कर रहा था। एक दिन उसका 9 बर्षीय बालक सड़क पार कर रहा था। तभी एक तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने उसे टक्कर मार दी और फरार हो गया। जब हरिराम को खबर मिली तो वह बेसुध हो कर सड़क कि ओर दौड़ा। उसने आस-पास देखा कुछ भी सुविधा नजर नहीं आई जिससे वह तुरंत अस्पताल पहुंच सके। तभी एक गाड़ी गुजरी जिसमे एक सेठ अपने बालक और ड्राईवर के साथ शहर कि ओर जा रहा था। हरिराम ने गाड़ी को रुकवाया और अपनी व्यथा बताई। सेठ ने कुछ देर सोचा फिर अनसुनी कर के ड्राईवर को गाड़ी आगे बढ़ाने का इशारा किया। हरिराम हांथ जोड़े रोता-बिलखता ही रह गया। थोड़ा दूर जाने पर सेठ के बालक ने कहा पिताजी आपने यह अच्छा नहीं किया, दीन-दुखियों की मदद करना चाहिए। वह व्यक्त्ति परेशानी में था। उसकी मदद हमको करना चाहिए था। भगवान भी उसी की मदद करते हैं, जो दूसरों कि मदद करते हैं।
सेठ ने चिल्लाते हुए, बालक से कहा अच्छा अब तू मुझे समझाएगा कि क्या करना है। और वो लोग आगे बढ़ते चले गए।
हरिराम को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, तभी एक शक्ति का अनुभव उसको हुआ और अकेले ही बालक को उठा कर उसने शहर की ओर दौड़ लगा दी। दौड़ते-हांफते हुए वह किसी तरह अस्पताल पहुंचा। बड़ी मशक्कत के बाद डॉक्टर ने उस बालक को बचा लिया एवं कुछ दिन अस्पताल में ही आराम करने कि सलाह दी। फिर हरिराम पुनः अपने जीवन में व्यस्त हो गया। जैसा कि समय कभी कह कर नहीं आता और हमें कभी नहीं भूलना चाहिए की हम भी समय के आधीन हैं। कुछ यूं हुआ कि, सेठ पुनः उस रास्ते से गुजर रहा था। रात अधिक हो गई थी। उसका ड्राईवर किसी कारणवश साथ में नहीं आ पाया था। तो सेठ अकेला ही गाड़ी चलाते हुए जा रहा था। तभी सामने से आते हुए अनियंत्रित ट्रक ने उसकी गाडी को टक्कर मार दी। सभी गांव वाले सड़क पर पहुंचे। पर किसी ने भी अस्पताल पहुंचाने कि हिम्मत नहीं कि। तभी हरिराम कि नजर उस सेठ पर पड़ी और उसने उसे पहचान लिया।
तुरंत उसने कंधे पर रख कर सेठ को अस्पताल तक पहुंचाया। डॉक्टर ने कहा की खून की आवश्यकता है, सयोंग से ब्लड ग्रुप भी एक ही निकला। तुरंत हरिराम ने अपना खून दे दिया। सेठ के परिवार के सभी लोग इकट्ठे हुए। तभी सेठ को कुछ होश आया तो सामने हरिराम को देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया, कि यह वही व्यक्त्ति है। जिसकी मैंने मदद नहीं की थी और उसी ने आज मेरी जान बचाई। सेठ को अपने किये पर पछतावा हो रहा था। उसने प्रतिज्ञा की कि अब कभी भी अपनी गलती को नहीं दोहराएगा एवं आजीवन लोगों कि मदद करेगा। उसने हरिराम को भी अपने यहां रोजगार से लगा लिया।
हमेशा लोगों कि मदद करना चाहिए कभी भी ये विचार मन में नहीं लाना चाहिए कि अपना क्या जा रहा है या अपने साथ थोड़े ही हुआ है। ऐसा कोई आपको लेकर भी सोच सकता है, जब आप मुसीबत में हों।दूसरों की मदद करना ही मानव जीवन की सार्थकता है।

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