Wednesday, 7 September 2016

वास्तविक सौंदर्य


हर सुबह घर से निकलने से पहले सुकरात खुद को आईने के सामने खड़े होकर कुछ देर तक तल्लीनता से निहारते थे। एक दिन उनके एक शिष्य ने उन्हें ऐसा करते देखा। आईने में खुद की छवि को निहारते सुकरात को देख उसके चेहरे पर बरबस ही मुस्कान तैर गई। सुकरात उसकी और मुड़े और बोले, 'बेशक, तुम यही सोचकर मुस्कुरा रहे हो न कि यह कुरूप बूढ़ा आईने में खुद को इतनी बारीकी से क्यों देखता है और मैं ऐसा हर दिन ही करता हूं।'
   शिष्य यह सुनकर लज्जित हो गया और सिर झुकाकर खड़ा रहा। इससे पहले की वह माफी मांगता, सुकरात ने कहा, 'आईने में हर दिन अपनी छवि देखने पर मैं अपनी कुरूपता के प्रति सजग हो जाता हूं। इससे मुझे ऐसा जीवन जीने के लिए प्रेरणा मिलती है जिसमें मेरे सदगुण  इतने निखरें और दमकें कि उनके आगे मेरे मुखमंडल की कुरूपता फीकी पड़ जाए।'
  शिष्य ने कहा, तो क्या इसका अर्थ यह है कि सुंदर व्यक्तियों को आईने में अपनी छवि नहीं देखनी चाहिए?
  'ऐसा नहीं है' सुकरात ने कहा। जब वे स्वयं को आईने में देखें तो यह अनुभव करें कि उनके विचार, वाणी और कर्म उतने ही सुंदर हों, जितना उनका शरीर है। वे सचेत रहें कि उनके कर्मों की छाया उनके प्रीतिकर व्यक्तित्व पर नहीं पड़े।'


  

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