Sunday, 4 September 2016

हमारी मानसिक जंजीरें


एक व्यक्ति कहीं से जा रहा था, अचानक उसने  सड़क के किनारे बंधे हांथियों को देखा और वह रुक गया। उसने देखा की हांथियों के अगले पैर में रस्सी बंधी हुई है। उसे इस बात पर आश्चर्य हुआ कि हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं। 
    वे चाहते तो खुद को आजाद कर सकते थे, पर वे ऐसा नहीं कर रहे थे। उसने पास खड़े महावत से पूछा 'भला ये हाथी किस प्रकार इतनी  शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास भी नहीं कर रहे हैं। 
     महावत ने कहा, 'इन हांथियों को छोटी उम्र से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है। उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती कि इस बंधन को तोड़ सकें, बार-बार कोशिश करने के बाद भी रस्सी न तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता  जाता है कि वे इन रस्सियों को नहीं तोड़ सकते और बड़े होने पर भी उनका यह यकीन बना रहता है। 
  इस लिए वे कभी इन्हें तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते। उस आदमी को यह बात बड़ी रोचक लगी। उसने इस बारे में एक संत से चर्चा की। संत ने मुस्कुराकर कहा ' ये जानवर इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वे इस बात में यकीन करते हैं।
   दरअसल कई इंसान भी इन्हीं हाथियों की तरह अपनी किसी विफलता को कारण मान बैठते हैं कि अब उनसे ये काम हो ही नहीं सकता। वे अपनी बनाई हुई मानसिक जंजीरों में पूरा जीवन गुजार देते हैं, लेकिन मनुष्य को कभी प्रयास छोड़ना नहीं चाहिए। लगातार प्रयास से ही सफलता मिलती है।


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