Monday, 26 September 2016

अगली भी अच्छी पिछ्ली भी अच्छी बीच वाली को जूता मारो


एक बार एक गांव में एक साधू आया और गांव के बाहर एक कुएं के पास एक वृक्ष के नीचे कुछ दिनों के लिए ठहर गया। तीन स्त्रियां वहां पर पानी भरने के लिए आईं, उसी समय साधू कुछ बड़बड़ा रहा था कि अगली भी अच्छी पिछली भी अच्छी बीच वाली को जूता मारो। ये सुन कर बीच में चल रही स्त्री को अपमान महसूस हुआ एवं बाकी दोनों स्त्रियां हँसने लगीं। पर स्त्री ने किसी से कुछ नहीं कहा। अगले दिन साधू फिर वही बड़बड़ा रहा था। उस दिन भी स्त्री ने कुछ नहीं कहा। पर उसके अगले दिन भी यही बात सुन कर उससे रहा नहीं गया तो उसने घर पर यह बात बताई यह सुनकर उसका पति गांव वालों के साथ साधू के पास पंहुचा एवं साधू से जानना चाहा कि वह इस तरह की बात क्यों कर रहा है। तो साधू ने कहा की आप लोग गलत समझ रहे हैं, मैं इस स्त्री को नहीं मनुष्य जीवन को लेकर यह बात कह रहा हूँ। में तो अपनी धुन में यह बात कहता रहता हूँ। किसी स्त्री के लिए नहीं कह रहा हूँ। मनुष्य जब बाल्यावस्था में होता है, तो वह चंचल एवं मन का साफ होता है। उसके मन में कोई भी छल-कपट नहीं होता। किन्तु जब वह वयस्क होता है, वह लालची एवं स्वार्थी हो जाता है। धन के लालच में वह कई तरह के गलत कार्य करता है एवं उसका मन अपवित्र हो जाता है। परन्तु जब वह वृद्धावस्था में कदम रखता है। पुनः छल-कपट से मुक्त हो कर ईश्वर के चरणों में जीवन अर्पण कर देता है। एवं पुनः मन पवित्र हो जाता है। अतः जीवन के जो बीच की अवस्था है, अर्थात यौवनावस्था यही मनुष्य को उसके मार्ग से भटकाती है। बहुत कम लोग ही इस अवस्था में अपने आप को संतुलित कर पाते है। यह अवस्था मनुष्य को भ्रमित करती है।

इसी लिए में कहता हूं, कि अगली भी अच्छी, पिछली भी अच्छी बीच वाली को जूता मारो। मतलब इस अवस्था में नियम एवं संयम से रहो। एवं गलत विचारों को दबा के रखो।

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