Tuesday, 6 September 2016

गुरु कोई भी हो सकता है


महादेव गोविन्द रानाडे जब मुम्बई हाईकोर्ट के जज थे। उन्हें नई-नई भाषाएं सीखने का शौक था। जब उन्हें पता चला कि उनका बार्बर दोस्त बहुत अच्छी बांग्ला जानता है। तो उन्होंने उसे गुरु बना लिया। जितनी देर बार्बर उनकी हजामत करता वे उससे बांग्ला सीखते।
   यह देखकर उनकी पत्नी बोलीं औरों को पता चलेगा कि हाईकोर्ट के जज साहब साधारण आदमी से भाषा सीख रहे हैं। तो कितनी जग हंसाई होगी। यदि बांग्ला सीखना ही है तो किसी अच्छे से विद्धवान की मदद ले सकते हैं।
   रानाडे ने यह सुनकर पत्नी को समझाया कि, ज्ञान तो किसी से भी लिया जा सकता है। चाहे वह साधारण आदमी ही क्यों न हो। मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं एक साधारण आदमी से भाषा सीख रहा हूँ।
   ज्ञान की चाह रखने वाले साधारण और असाधारण में फर्क नहीं करते। वे तो किसी से शिक्षित होकर अपने ज्ञान की प्यास बुझाते हैं। ज्ञान जहाँ से भी मिले ले लेना चाहिए। जरुरी नहीं ज्ञान के लिए विद्धवान की तलाश की जाए। क्यों कि ज्ञान किसी के पास भी हो सकता है। एक साधारण आदमी के पास भी।

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