Wednesday, 21 September 2016

निरर्थक चर्चा में खर्च न करें समय


भगवान बुद्ध, अनमोल समय के सदुपयोग के पक्षधर थे। निकम्मी बातों में समय गंवाने का सदा विरोध किया करते थे। कोई आदमी उनके पास आया और बोला, भगवान आप बार-बार दुःख और विमुक्ति पर ही बोलते हैं। कृपया यह तो बताइए यह दुःख होता किसको है? और दुखों से विमुक्ति होती किसको है?

प्रश्न करने वाले का प्रश्न निरर्थक था। पर बुद्ध कहां ऐसी निरर्थक चर्चा में उलझने वाले थे। वह प्रेमपूर्वक बोले भाई तुम्हें प्रश्न करना ही नहीं आता है। प्रश्न यह नहीं करना चाहिए था कि दुःख किसे होता है। तुम्हें प्रश्न करना चाहिए था कि दुःख क्यों होता है? और विमुक्त कैसे होते हैं?

सार्थक बात यह है कि दुःख से छुटकारा पाएं और इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि दुःख का कारण क्या है? और उसका निवारण क्या है? इसे छोड़ सभी चर्चाएं व्यर्थ होती हैं। यह सब निरर्थक नहीं तो और क्या है।

तभी बुद्ध से कोई पूछता है कि भगवान यह बताएं कि संसार को किसने बनाया है? तो फिर वह प्यार से समझाते हैं कि किसी विष  बुझे तीर से घायल व्यक्त्ति कभी नहीं पूछता कि उसे किसने बनाया है। बेहतर है कि उस तीर को निकाल लिया जाए तो पीड़ा से मुक्त होकर इलाज कराया जाए। तभी वह दुःख मुक्त हो सकता है।

इंसान के पास जिंदगी में बहुत कम समय है अगर वह फिजूल की बातों में यूं ही गंवा देगा तो कुछ हासिल नहीं कर सकता। इसलिए निरर्थक बातों से बचना चाहिए। इसी में समझदारी है।

No comments:

Post a Comment

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला पैदा हो गया, जो सांप तो क्या, किसी भी जानवर से लड़ना नहीं चाहता था। सभी नेवलों में यह बात फैल गई। आखिरकार एक ...