एक बहुत बड़े तालाब में एक बूढ़ा बगुला रहता था। बुढ़ापे के कारण वह कमजोर हो गया था। इस कारण मछलियां पकड़ने में असमर्थ था। एक बार एक केकड़ा उसके पास आया। बगुले को उदास देखकर उसने पूछा, 'मामा, तुम रो क्यों रहे हो? क्या तुमने आज-कल खाना पीना छोड़ दिया है?' बगुले ने बताया, 'पुत्र, मेरा जन्म इसी तालाब के पास हुआ था। यहीं मैंने इतनी उम्र बिताई। अब मैंने सुना है कि यहाँ बारह बर्षों तक पानी नहीं बरसेगा। ऐसा मुझे एक ज्योतिषी ने बताया है।'
बगुले की यह बात केकड़े ने अपने साथियों को बताई। वे सब बगुले के पास पहुँचे। उन्होंने बगुले से पूछा, 'मामा, ऐसा कोई उपाय बताओ, जिससे हम सब बच सकें।' बगुले ने बताया, 'यहाँ से कुछ दूर एक बड़ा सरोवर है। यदि तुम लोग वहां जाओ तो तुम्हारे प्राणों की रक्षा हो सकती है।' सभी ने एक साथ पूछा, 'हम उस सरोवर तक पहुचेंगे कैसे?' चालाक बगुले ने कहा, 'मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूँ। तुम लोग चाहो तो मैं तुम्हें पीठ पर बैठाकर उस तालाब तक ले जा सकता हूँ।'
सभी बगुले की पीठ पर चढ़कर दूसरे तालाब में जाने के लिए तैयार हो गए। दुष्ट बगुला प्रतिदिन एक मछली को अपनी पीठ पर चढ़ाकर ले जाता और शाम को तालाब पर लौट आता। इस प्रकार उसकी भोजन की समस्या हल हो गई। एक दिन केकड़े ने कहा, 'मामा, अब मेरी भी तो जान बचाइए।' उसने केकड़े को अपनी पीठ पर बैठा लिया। उड़ते हुए वह उस बड़े पत्थर पर उतरा, जहाँ वह हर दिन मछलियों को खाया करता था। केकड़े ने वहां पर पड़ी हुई हड्डियों को देखा तो सारा माजरा उसे समझ आ गया। केकड़े ने बगुले की गर्दन जकड़ ली और अपने तेज दांतों से उसे काट डाला। बगुला वहीं मर गया। चौकस दृष्टि और तीव्र बुद्धि से केकड़े ने अपनी व तालाब के अन्य साथियों की जान बचा ली।
बगुले की यह बात केकड़े ने अपने साथियों को बताई। वे सब बगुले के पास पहुँचे। उन्होंने बगुले से पूछा, 'मामा, ऐसा कोई उपाय बताओ, जिससे हम सब बच सकें।' बगुले ने बताया, 'यहाँ से कुछ दूर एक बड़ा सरोवर है। यदि तुम लोग वहां जाओ तो तुम्हारे प्राणों की रक्षा हो सकती है।' सभी ने एक साथ पूछा, 'हम उस सरोवर तक पहुचेंगे कैसे?' चालाक बगुले ने कहा, 'मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूँ। तुम लोग चाहो तो मैं तुम्हें पीठ पर बैठाकर उस तालाब तक ले जा सकता हूँ।'
सभी बगुले की पीठ पर चढ़कर दूसरे तालाब में जाने के लिए तैयार हो गए। दुष्ट बगुला प्रतिदिन एक मछली को अपनी पीठ पर चढ़ाकर ले जाता और शाम को तालाब पर लौट आता। इस प्रकार उसकी भोजन की समस्या हल हो गई। एक दिन केकड़े ने कहा, 'मामा, अब मेरी भी तो जान बचाइए।' उसने केकड़े को अपनी पीठ पर बैठा लिया। उड़ते हुए वह उस बड़े पत्थर पर उतरा, जहाँ वह हर दिन मछलियों को खाया करता था। केकड़े ने वहां पर पड़ी हुई हड्डियों को देखा तो सारा माजरा उसे समझ आ गया। केकड़े ने बगुले की गर्दन जकड़ ली और अपने तेज दांतों से उसे काट डाला। बगुला वहीं मर गया। चौकस दृष्टि और तीव्र बुद्धि से केकड़े ने अपनी व तालाब के अन्य साथियों की जान बचा ली।




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