लाओत्से ने एक बार मछली पकड़ना सीखने का निश्चय किया। उन्होंने मछली पकड़ने की एक छड़ी बनाई, उसमें डोरी और हुक लगाया फिर वह उसमें चारा बांधकर नदी किनारे मछली पकड़ने के लिए बैठ गए। कुछ समय बाद एक बड़ी मछली हुक में फंस गई। लाओत्से इतने उत्साह में थे कि उन्होनें छड़ी को पूरी ताकत लगाकर खींचा। मछली ने भी भागने की पूरी ताकत लगाई। नतीजा यह हुआ कि छड़ी टूट गई और मछली भाग गई।
लाओत्से ने दूसरी छड़ी बनाई और दोबारा मछली पकड़ने के लिए नदी किनारे गए। कुछ समय बाद एक दूसरी बड़ी मछली हुक में फंस गई। लाओत्से ने इस बार इतनी धीरे-धीरे छड़ी खींची कि वह मछली लाओत्से के हाथ से छड़ी छुड़ाकर भाग गई।
लाओत्से ने तीसरी बार छड़ी बनाई और नदी किनारे आ गए। तीसरी मछली ने चारे में मुंह मारा। इस बार लाओत्से ने उतनी ही ताकत से छड़ी को ऊपर खींचा जितनी ताकत से मछली छड़ी को नीचे खींच रही थी। इस बार न छड़ी टूटी, न मछली हाथ से गई। मछली जब छड़ी को खींचते-खींचते थक गई तब लाओत्से ने आसानी से उसे पानी के बाहर खींच लिया।
उस दिन शाम लाओत्से ने अपने शिष्यों से कहा, 'आज मैंने संसार के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत का पता लगा लिया है। यह समान बलप्रयोग करने का सिद्धांत है। जब मैंने कांटा बल पूर्वक खींचा तो यह टूट गया और जब मैंने ढीला छोड़ा तो मछली भाग गई।
ठीक इसी तरह से जब यह संसार तुम्हें किसी ओर खींच रहा हो, तब तुम समान बलप्रयोग करते हुए दूसरी ओर जाओ, सफल होगे। इसके उलट यदि तुम प्रचंड बल का प्रयोग करोगे तो तुम नष्ट हो जाओगे और यदि तुम क्षीण बल का प्रयोग करोगे तो यह संसार ही तुमको नष्ट कर देगा।


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