Friday, 30 September 2016

दो भाई


दो भाई थे ।आपस में बहुत प्यार था।
 खेत अलग अलग थे आजु बाजू। 
बड़ा भाई शादीशुदा था ।
छोटा अकेला ।
एक बार खेती बहुत अच्छी हुई अनाज
बहुत हुआ ।
खेत में काम करते करते बड़े भाई ने
बगल के खेत में छोटे भाई को
खेत देखने का कहकर खाना खाने चला गया।
उसके जाते ही छोटा भाई सोचने लगा । खेती
तो अच्छी हुई इस बार अनाज भी बहुत
हुआ। मैं तो अकेला हूँ, बड़े भाई की तो
गृहस्थी है। मेरे लिए तो ये अनाज
जरुरत से ज्यादा है। भैया के साथ तो भाभी बच्चे है ।
उन्हें जरुरत ज्यादा है।
ऐसा विचारकर वह 10 बोरे अनाज
बड़े भाई के अनाज में डाल देता
है। बड़ा भाई भोजन करके आता है ।
उसके आते ही छोटा भाई भोजन
के लिए चला जाता है।
भाई के जाते ही वह विचारता है ।
मेरा गृहस्थ जीवन तो अच्छे से चल रहा है...
भाई को तो अभी गृहस्थी जमाना है... उसे
अभी जिम्मेदारिया सम्हालना है...
मै इतने अनाज का
क्या करूँगा...
ऐसा विचारकर उसने 10 बोरे अनाज
छोटे भाई के खेत में डाल दिया...।
दोनों भाईयों के मन में हर्ष था...
अनाज उतना का उतना ही था और
हर्ष स्नेह वात्सल्य बढ़ा हुआ था...।
सोच अच्छी रखेंगें तो प्रेम
अपने आप बढेगा ...........
अगर ऐसा प्रेम भाई भाई में हुआ तो दुनिया की कोई भी ताकत आपके परिवार को तोड़ नही सकती...

"नरेंद्र मोदी'' द रियल हीरो


अभी तक के सैन्य घटनाक्रम में जो कुछ भी हुआ। हमारे देश के लिए बहुत ही सम्मानजनक है। हम अब गर्व से कह सकते हैं, कि "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी" ने जो कहा सो किया। पी ओ के सर्जिकल स्ट्राइक की घटना ने हम सब भारतियों को एक नया उत्साह दिया है, एक नई उम्मीद की किरण जगी है। हम सभी को मिल कर सेना का उत्साह बढ़ाना चाहिए। बहुत समय बाद राजनीति में कोई शेर आया है, अभी तक सभी राजनीतिज्ञ पाकिस्तान के विषय पर सिर्फ चर्चाएं और समझौते ही करते आए हैं। अब लग रहा है, देर से ही सही हम सही और गलत में फर्क समझने लगे हैं। जब पड़ोसी गद्दार और नीच हो तो किसी भी तरह का समझौता  उसकी मानसिकता को नहीं बदल सकता। आज तक हम यही कोशिश करते आये हैं कि कभी न कभी पाकिस्तान समझ जाएगा कि हम शांति से निपटारा चाहते हैं। पर हर समझौते को उसने हमारी कमजोरी समझा। आज हम सभी भारतीय सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। सभी धर्म के लोग हमारे देश में निवास करते हैं, और करते रहेंगे। उनको जातिवाद के नाम पर भड़काने से या हिंसा फैलाने से सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान का असली मकसद ही नजर आता है। चंद लोगों को उकसा कर आतंकवादी सोचते हैं, कि वो अमन और चैन खत्म कर देंगे। ये तो कभी हो ही नहीं सकता। आतंकवादियों के आका जो की खुद ऐशो-आराम से नवाबी शौक पूरे कर रहे हैं, गरीब और अशिक्षित युवाओं को धर्म के नाम पर उकसा रहे हैं। और आतंकवाद की और धकेल रहे हैं। मोदी जी ने आतंकवाद को लगाम लगाने की शुरुवात कर दी है। अब ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया है।

सफलता का रहस्य क्या है?



एक बार एक व्यक्त्ति ने सुकरात से पूछा की सफलता का रहस्य क्या है?
सुकरात ने उस व्यक्त्ति से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो। व्यक्ति  नदी किनारे आ गया फिर सुकरात ने कहा की मेरे साथ-साथ नदी में आगे बढ़ो। दोनों नदी में आगे बढ़ने लगे, बढ़ते-बढ़ते नदी का पानी गले तक आ गया। तभी अचानक सुकरात ने उस व्यक्ति  का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया। व्यक्ति  पानी से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा, लेकिन सुकरात ताकतवर थे। उस व्यक्ति  को तब तक डुबाये रखा जब तक तक की वो नीला न पड़ जाए। फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया। बाहर निकलते ही वह व्यक्ति  जोर-जोर से हांफने लगा और तेजी से सांस लेने लगा।
सुकरात ने पूछा," जब तुम पानी के अंदर थे तो क्या चाहते थे?"
व्यक्ति  ने उत्तर दिया, सांस लेना चाहता था।
सुकरात ने कहा, यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को भी इसी तरह चाहोगे जिस तरह सांस लेना चाह रहे थे। तो सफलता सुनिश्चित है। इसके अलावा सफलता का और कोई रहस्य नहीं है।

Thursday, 29 September 2016

प्रणाम का महत्व



       महाभारत का युद्ध चल रहा था -
एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि -


"मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"
उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई -
भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|
तब -
श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -
श्री कृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -
शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -
द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने -
"अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!
"वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्री कृष्ण यहाँ लेकर आये है" ?
तब द्रोपदी ने कहा कि -
"हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं" तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया -
भीष्म ने कहा -
"मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्री कृष्ण ही कर सकते है"
शिविर से वापस लौटते समय श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि -
"तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है " -
" अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन- दुःशासन, आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती " -
......तात्पर्य्......
वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि -
"जाने अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है "
" यदि घर के बच्चे और बहुएँ प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर में कभी कोई क्लेश न हो "
बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं उनको कोई "अस्त्र-शस्त्र" नहीं भेद सकता -
"निवेदन सभी इस संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाय।"
*क्योंकि*:-



*प्रणाम प्रेम है।*
*प्रणाम अनुशासन है।*
प्रणाम शीतलता है।             
प्रणाम आदर सिखाता है।
*प्रणाम से सुविचार आते है।*
प्रणाम झुकना सिखाता है।
प्रणाम क्रोध मिटाता है।
प्रणाम आँसू धो देता है।
*प्रणाम अहंकार मिटाता है।*
*प्रणाम हमारी संस्कृति है।*
    *सबको प्रणाम*

पूर्वाग्रह


एक मेंढक अपने रास्ते जा रहा था, तभी एक सांप अचानक से उसके सामने आ गया। सांप को सामने देख कर मेंढक ने तो आँखे ही बंद कर लीं। तभी उसके दिमाग में एक तरकीब आई। सांप को आगे बढ़ता हुआ देख कर उसकी धड़कन बढ़ गई, फिर भी हिम्मत कर के उसने सांप से निवेदन किया की अगर वो साबित कर दे कि सांप से जहरीला मेंढक होता है, तो क्या सांप उसको छोड़ देगा। सांप को लगा की मरना तो इसको है ही देख लेता हूं, ये कैसे साबित करता है। 

तभी मेंढक ने कहा कि जैसा में बोलूं वही करना। सांप ने सहमति में सर हिला दिया। मेंढक ने सांप से कहा मैं झाड़ियों में छुप जाऊँगा, जब कोई इंसान यहाँ से गुजरेगा तुम उसको काटना और छुप जाना मैं झाड़ियों से बाहर निकल आऊंगा और टर्र-टर्र की आवाज निकलूंगा। और वो इंसान समझेगा की मेंढक ने काटा है, उसको कुछ नहीं होगा। और फिर थोडा आगे चल कर फिर उसको में काटूँगा और तुम बाहर आ जाना वो मर जाएगा। 

सांप को लगा मेंढक खुद को बचाने के लिए वेबकुफी भरी बातें कर रहा है। चलो इसको भी आजमा लेते हैं। तभी एक व्यक्त्ति वहां से गुजर रहा था। योजना के अनुसार मेंढक छुप गया। सांप ने उस व्यक्त्ति के पैर पर काटा और तुरंत छुप गया। तभी मेंढक बाहर  आ कर टर्र-टर्र करने लगा। व्यक्त्ति ने मेंढक को देखा तो उसको लगा अरे मेंढक ने काटा है, कुछ बात नहीं कह कर आगे बढ़ गया। व्यक्त्ति को कुछ नहीं हुआ, सांप ने देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। और मन ही मन सोचने लगा कि मैं इतना जहरीला हूँ, कितने ही लोगों को अपने जहर से मारा है मैंने। इस इंसान को तो तुरंत मर जाना था, परंतु ये तो मजे से चल कर जा रहा है। 

तभी मेंढक ने कहा देखा मेरी बात सच हुई ना। सांप ने कहा ठीक है- ठीक है। चलो अब आगे क्या करना है, मेंढक बोला चलो अब आगे चल कर तुम झाड़ियो में छुप जाओ और मैं उसको काटता हूँ। ठीक है कहकर दोनों आगे बढ़ चले। व्यक्त्ति के पास पहुँच कर सांप छुप गया एवं मेंढक ने व्यक्त्ति को काटा और तुरंत झाड़ियों में छुप कर सांप को आगे आने का इसारा कर दिया। सांप तुरंत आगे आ गया, सांप को सामने देख कर व्यक्त्ति तुरंत घबराहट की बजह से मर गया। उसको लगा कि सांप ने काट लिया। सांप के आश्चार्य का ठिकाना न रहा उसको लगा की मेंढक के काटने से मर गया और मेरे काटने से कुछ नहीं हुआ। मेंढक की जीत हुई और वो सांप से दूर चला गया। इस तरह वह अपनी जान बचा पाने में सफल रहा।

उस व्यक्त्ति की मौत पूर्वाग्रह से हुई। हममे से बहुत से लोग इसी तरह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। पूर्वाग्रह के कारण ही हम सच्चाई जानना ही नहीं चाहते, और फैसले ले लेते हैं।

Wednesday, 28 September 2016

दोस्त हों तो ऐसे


एक समय की बात है, एक जंगल में चार मित्र रहा करते थे, कछुआ, हिरन, चूहा और कौवा। चारों में घनिष्ठ मित्रता थी। वो एक-दूसरे पर जान छिड़के थे। कछुआ जिस नदी में रहता था। उसके पास ही एक जामुन का पेड़ था, उस पर कौवा घोंसला बना कर रहता था। पेड़ के नीचे ही चूहा बिल बना कर रहता था। हिरन जंगल में उनके आस-पास बना रहता था। कछुआ ज्यादातर नदी में ही घूमता रहता था। कौवा आस-पास खाने के लिए घूमता रहता था। इसी तरह हिरन और चूहा भी आस-पास घूम कर खाने का इंतजाम किया करते थे। और जब इकठ्ठा होते तो साथ में बहुत खेलते एवं धमाचौकड़ी करते थे। एक बार की बात है, सभी नदी किनारे एकत्रित हुए शाम का समय था। हल्का अंधेरा भी हो गया था। लेकिन अभी तक हिरन नदी के पास नहीं पहुंचा। तो कौवे ने बोला आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि हिरन इस समय तक बाहर रहा हो, मुझे तो चिंता हो रही है। कहीं कोई मुसीबत में न हो। कौवा बोला में उसे देख कर आता हूँ, पर अभी अँधेरे में तो कुछ दिखाई भी नहीं देगा। हमें सुबह तक का इंतजार करना होगा। तभी कछुए ने कहा में अभी से निकल पड़ता हूँ। क्यों कि मेरी रफ्तार कम है। तुम सुबह उड़ कर आ जाना। चूहा बोला मुझे कहाँ नींद आने वाली है, मैं भी साथ में ही चलता हूँ। वो दोनों जंगल की ओर बढ़ चले। बड़ी मुश्किल एवं व्याकुलता में कौवे ने रात गुजारी। सुबह वो भी उड़ चला, रास्ते में  उसने कछुए और चूहे को भी देख लिया। कौवे ने उनको इशारा कर दिया और आगे बढ़ गया। रास्ते में जाते हुए वो हिरन को आवाज लगाते जा रहा था। तभी हिरन की रोने की आवाज सुन कर उसने पहचान लिया। उसने पास जाकर देखा कि हिरन शिकारी के जाल में फंसा हुआ है। हिरन ने कौवे को बहुत ही करुण स्वर में बोला अब तो मेरा बच पाना संभव नहीं है। शिकारी आता ही होगा। तुम मित्रों से मेरा नमस्कार कहना। कौवे ने हिरन को हिम्मत देते हुए कहा, चिंता मत करो मित्र में अभी चूहे को अपनी पीठ पर बैठा कर ला रहा हूँ। वह इस जाल को काट देगा। कौवा उड़ चला हिरन इंतजार करने लगा। थोड़ी ही देर में कौवा, चूहे को पीठ पर बैठा कर ले आया। उसने हिरन के जाल को काट दिया, और हिरन आजाद हो गया। तब तक कछुआ भी वहां पहुंच चूका था। तभी शिकारी की आने की आहट हुई। कौवा पेड़ पर चढ़ गया, चूहा भी छुप गया और हिरन झाड़ियों के पीछे ओझल हो गया। कछुआ रफ्तार कम होने की वजह से ज्यादा दूर तक नहीं जा पाया। तभी शिकारी की नजर जाल पर पड़ी और जाल में छेद देख कर वह समझ गया की, शिकार फंसने के बाद भी हांथ से निकल गया। उसने पछताते हुए  पैर को उठा कर जोर से जमीन पर मार तभी कुछ टकराने का अहसास हुआ। जमीन पर देखा तो कछुआ दिखाई दिया। उसने सोचा की भागते भूत कि लंगोट ही सही। आज इससे ही काम चलाता हूं। कहते हुए कछुए को एक थैले में रख लिया। कछुए ने तो समझ लिया कि आज वो नहीं बचेगा। जैसे ही शिकारी जाने को हुआ। हिरन, चूहा और कौवे इकट्ठे हुए और एक योजना बनाई। हिरन ने कहा में शिकारी के आगे आकर लंगड़ाते हुए चलूंगा। जिससे वो समझेगा की में घायल हूं और लालच में आकर थैले को जमीन पर रखकर मेरी तरफ भागेगा। तभी तुम लोग कछुए को आजाद कर देना। ऐसा ही हुआ शिकारी ने हिरन को लंगड़ाते हुए देखा और थैले को फेंक कर उसको पकड़ने के लिए दौड़ा। हिरन कुलांचे भरते हुए शिकारी को दूर तक ले गया। कभी इधर-कभी उधर दौड़ते हुए जंगल में गुम हो गया। चूहे ने थैले को काट कर कछुए को भी आजाद कर दिया। और सभी अपने स्थान पर सुरक्षित पहुंच गए। अतः सच्चे मित्र हमेशा एक-दूसरे की मदद करके मुश्किल से मुश्किल हालात से निपट लेते हैं।

तितली की मदद



एक दिन एक व्यक्त्ति अपने घर के आंगन में घूम रहा था। तभी उसकी नजर एक पौधे की टहनी पर पड़ी, जहां एक तितली का कोकून था। अब हर रोज वो आदमी उसको देखने लगा। एक दिन उसने ध्यानपूर्वक देखा कि कोकून में एक छोटा सा छेद बना हुआ है। उस दिन वो घंटों बैठ कर देखता रहा की तितली उस खोल से बाहर निकलने की बहुत कोशिश कर रही है। पर बहुत देर तक प्रयास करने के बाद भी वो असफल हो रही थी। थक-हार कर वो शांत हो गई और किसी भी प्रकार की हलचल नहीं कर रही थी।

तभी उस आदमी ने सोचा कि वो उस तितली की मदद करेगा। एक केंची से उसने कोकून के छेद को बड़ा कर दिया जिससे की वो तितली आसानी से बाहर निकल सके। उसके अपेक्षा के अनुरूप तितली कोकून से बाहर बिना किसी संघर्ष के तो आ गई। पर उसका शरीर सूजा हुआ तथा पंख सूखे हुए थे।

वो आदमी तितली को यह सोचकर देखता रहा कि, अब तितली अपने पंख फैला कर उड़ने ही वाली है। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि इसके उलट हुआ और वह तितली कभी उड़ ही नहीं पाई। बाकी की जिंदगी तितली ने इधर-उधर घिसट-घिसट कर निकाली। 


वो आदमी अपनी दया और जल्दबाजी में ये नहीं समझ पाया की दरसल कोकून से निकलने की प्रक्रिया को प्रकृति ने इतना कठिन इसलिए बनाया है। जिससे कि तितली के शरीर में मौजूद तरल उसके पंखों में पहुंच कर पंखों को चिकना बना दे, और वह आसानी से उड़ सके। वास्तव में कभी-कभी हमारे जीवन में संघर्ष ही वो चीज होती है। जिसकी हमें सचमुच आवश्यकता होती है। यदि हम बिना किसी संघर्ष के सब कुछ पाने लगे तो हम भी एक दिन अपने जीवन में असफल हो जाएंगे। बिना परिश्रम और संघर्ष के हम उतने मजबूत नहीं बन पाते जितनी की हमारी क्षमता होती है। इसलिए जीवन में आपने वाले कठिन पलों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए, क्योंकि वो पल ही हमको कुछ ऐसा सिखा जाएंगे जो हमारी जिंदगी की लड़ाई को संभव बना पाएंगे।

सोच समझ कर बोलें



एक बार एक किसान ने अपने पड़ोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया। उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा।
संत ने किसान से कहा, तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर के ले आओ, और उन्हें शहर के बीचों-बीच जाकर रख दो। किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया।

तब संत ने कहा, अब जाके उन पंखों को इकट्ठा कर के वापस ले आओ।

किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे। और किसान खाली हांथ संत के पास पहुंचा। तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें बोल तो सकते हो पर वापस नहीं ले सकते।

अतः ध्यानपूर्वक बोलना चाहिए जिससे अपशब्द कहने से बच सकें।

हर जवाब बताने वाला गूगल खुद का जन्मदिन भूला


'गूगल' यह एक ऐसा शब्द है, जिससे पूरी दुनिया की जानकारी हांसिल की जा सकती है। चाहे कुछ भी जैसे की किसी शहर का एड्रेस, स्पेस, किसी रेसिपी, किसी कंपनी की डिटेल्स, किसी व्यक्त्ति विशेष की जानकारी, उसका जन्मदिन और भी बहुत कुछ जो हम नहीं जानते, वो गूगल से पता करते हैं। लेकिन वही गूगल खुद का जन्मदिन कब है,नहीं जानता। 27 सितम्बर को गूगल ने अपना 18 वां जन्मदिन मनाया है। असल में पहले से ही गूगल अलग-अलग दिनों में अपना जन्मदिन मनाता आ रहा है।

गूगल ने सबसे पहले 2013 में माना कि वह अपना जन्मदिन 4 अलग तारीखों में मना रहा है। अब उसने इसके लिए 27 सितम्बर को तय कर लिया है।

गूगल की शुरुआत 1998 में लैरी पेज और सेन्ग्रेई ब्रिन ने की थी। लेकिन उसका जन्म किस दिन हुआ यह गूगल को भी नहीं पता। साल 2006 से गूगल ने 27 सितम्बर के दिन अपना जन्मदिन मनाना शुरू किया है।

2004 में 7 सितम्बर को ऑनलाइन जारी किया गया था। इसका बर्थडे डूडल।

Tuesday, 27 September 2016

शहीदे-आज़म भगत सिंह


यह गाथा है महान क्रांतिकारी देशभक्त सरदार भगत सिंह के शौर्य और पराक्रम की। अपने 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन के अल्पकालीन जीवन में मातृभूमि के लिए बेहद ही महत्वपूर्ण योगदान दिया। देशभक्ति के लिए मर मिटने वाले ऐसे वीर पुरुष को शत-शत नमन। भगत सिंह का जीवन चरित्र लाखों नौजवानों को देश और मातृभूमि के प्रति कर्त्तव्य पालन की सीख देता है।

क्रन्तिकारी भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को पंजाब प्रान्त, जिला लायलपुर के बावली गाँव में हुआ था,जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। पाकिस्तान में भी भगत सिंह को आजदी के दीवाने की तरह याद किया जाता है। भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था।

जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ तब भगत सिंह 12 वर्ष के थे। उस समय जो मानवीय बर्बरता हुई थी। उसका प्रभाव भगत सिंह के मन पर भी पड़ा।

भगत सिंह एक स्पष्ट वक्ता और अच्छे लेखक थे। जब भगत सिंह वीर सावरकर से येरवडा में मिले। तो उनके कहने पर ही भगत सिंह की मुलाकात चंद्रशेखर आजाद से हुई थी। चंद्रशेखर आजद के दल में शामिल होने के कुछ ही समय बाद वो उनके दल के प्रमुख क्रन्तिकारी बन गए थे।

काकोरी कांड में गिरफ्तार हुए तमाम आरोपियों में से चार को मृत्युदंड की सजा तथा अन्य सोलह आरोपियों को आजीवन कारवास की सजा सुनाई गई थी। इस खबर ने भगत सिंह को क्रांति के अंगारे में बदल दिया। और उसके बाद भगत सिंह ने अपनी पार्टी "नौजवान भारत सभा" का विलय "हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन" कर के नई पार्टी "हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" का आव्हान किया।

भगत सिंह ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स को मार कर लिया। भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय एसेम्बली में बम फेंक कर अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाए एवं मजदुर विरोधी नीतियों का विरोध किया। इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाये एवं स्वेक्षिक गिरफ्तारी दी।

उन्होंने आमरण अनसन करते हुए जेल में 64 दिन तक भूख हड़ताल की।

देश की आजादी के लिए अपनी जान की परवाह किये बिना लड़ने वाले स्वतंत्रता सैनानी भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव को 23 मार्च 1931 की शाम करीब 7 बज कर 33 मिनट पर फांसी दे दी गयी।

भगत सिंह की इक्छा थी के उन्हें अपराधी की तरह फांसी पे चढ़ा कर नहीं, बल्कि युद्धबंदी की तरह गोली मार कर दंड दिया जाए, पर उनकी यह बात मान्य नहीं रखी गयी।

राजा राममोहन राय



राजा राममोहन राय 
जन्म: २२ मई १७७२ 
देहांत :२७ सितंबर १८३३ 
 
राजा राममोहन राय आधुनिक भारत के जनक और भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत थे। राजा राममोहन राय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। भारतीय सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषीय प्रेस के प्रवर्तक जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। स्वतंत्रता संग्राम एवं पत्रकारिता को गति प्रदान की। पत्रकारिता से आंदोलन को सही दिशा दी। उनकी दूरदर्शिता तथा वैचारिकता के सैकड़ों उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। हिंदी के प्रति उनका अगाध स्नेह था। वे रूढिवाद और कुरीतियों के विरोधी थे लेकिन संस्कार, परम्परा एवं राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे। वे स्वतंत्रता चाहते थे लेकिन चाहते थे कि इस देश के नागरिक उसकी कीमत पहचानें।


राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल में 1772 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 15 वर्ष की आयु तक उन्होंने बंगाली, संस्कृत, अरबी तथा फारसी का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उन्होंने किशोरावस्था में काफी जगह भ्रमण किया। 1803-1814 तक उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भी कार्य किया। कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया एवं ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्य को भी छोड़ दिया। बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने बहुत विरोध किया। अंधविश्वास को खत्म करने ले लिए कई कार्य किए। इनके प्रयासों के फलस्वरूप लॉर्ड बैट्रिक ने 4 दिसंबर 1829 को एक आदेश जारी करके सती प्रथा पर रोक लगा दी।

Monday, 26 September 2016

भोजन जो तनाव को कम करते हैं


आज की भागदौड़भरी जिंदगी ही तनाव का कारण है। इससे सभी व्यक्त्ति परेशान हैं। काम के बोझ और तनाव से खानपान भी प्रभावित होता है, जिसका सीधा असर हमारे शरीर पर पड़ता है। भोजन में कुछ जरुरी खाद्यपदार्थ शामिल करके हम तनाव को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।


दही, अखरोट, ओटमील, ग्रीन टी आदि।

दही:  

 

एक कप सादा लो- फेट दही लगभग 450 मिली ग्राम कैल्शियम प्रदान करता है, जो मिनरल्स का काम काम करता है एवं हड्डियों को मजबूत बनाता है। शोध से यह साबित हो चूका है कि अधिक कैल्शियम लेने से पीएमएस की आशंका कम हो जाती है। एक गिलास लस्सी तनाव से तुरंत राहत देती है।

अखरोट: 

अगर गुस्सा और लड़ाई-झगड़े का मूड हो, तो उस दौरान अखरोट खाने से आपका गुस्सा कम हो जाएगा। अखरोट में एल-आर्जिनाइन होता है, जो नाइट्रिक ऑक्साइड में बदल जाता है। नाइट्रिक ऑक्साइड रक्तवाहनियों को रिलेक्स रखने में मदद करता है। रक्त संचार को बढ़ाता है और त्वचा की कोशिकाओं में पोषक तत्वों को पहुंचता है, जिससे वह लंबे समय तक युवा रहती हैं। अखरोट में ओमेगा 3 फैट पाया जाता है जो त्वचा को कांतिमय बनाने के लिए जरुरी है, एवं मष्तिस्क के विकास में भी सहायक है।

ओटमील: 

इसमें पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है, जिससे हमारा शरीर सेरोटिन प्रोडयूस करता है। सेरोटिन मूड अच्छा करने का काम करता है और मन को शांति और आराम का अहसास करवाता है। केले के साथ इसे ब्रेकफास्ट में जरूर लें। यह बिना कैलोरी बढ़ाये शरीर को फिट रखता है।

ग्रीन टी: 


इसमें थियानाइन एक प्रकार का अमीनो एसिड होता है जो शरीर और दिमाग दोनों को आराम देता है। ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट मेटाबॉलिज़्म सिस्टम को दुरुस्त रखता है और त्वचा को धूप से होने वाले नुकसान से बचाता है। इसमें एक चम्मच शहद मिलाने से यह दिन को तरोताजा कर देती है।

इंसानियत


एक शहर से लगे हुए गांव के पास एक खतरनाक मोड़ था। उसी गांव में हरिराम अपने परिवार के साथ रहता था। वह दूसरे के खेतों में मजदूरी करके किसी तरह अपना और अपने परिवार का जीवन यापन कर रहा था। एक दिन उसका 9 बर्षीय बालक सड़क पार कर रहा था। तभी एक तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने उसे टक्कर मार दी और फरार हो गया। जब हरिराम को खबर मिली तो वह बेसुध हो कर सड़क कि ओर दौड़ा। उसने आस-पास देखा कुछ भी सुविधा नजर नहीं आई जिससे वह तुरंत अस्पताल पहुंच सके। तभी एक गाड़ी गुजरी जिसमे एक सेठ अपने बालक और ड्राईवर के साथ शहर कि ओर जा रहा था। हरिराम ने गाड़ी को रुकवाया और अपनी व्यथा बताई। सेठ ने कुछ देर सोचा फिर अनसुनी कर के ड्राईवर को गाड़ी आगे बढ़ाने का इशारा किया। हरिराम हांथ जोड़े रोता-बिलखता ही रह गया। थोड़ा दूर जाने पर सेठ के बालक ने कहा पिताजी आपने यह अच्छा नहीं किया, दीन-दुखियों की मदद करना चाहिए। वह व्यक्त्ति परेशानी में था। उसकी मदद हमको करना चाहिए था। भगवान भी उसी की मदद करते हैं, जो दूसरों कि मदद करते हैं।

सेठ ने चिल्लाते हुए, बालक से कहा अच्छा अब तू मुझे समझाएगा कि क्या करना है। और वो लोग आगे बढ़ते चले गए।

हरिराम को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, तभी एक शक्ति का अनुभव उसको हुआ और अकेले ही बालक को उठा कर उसने शहर की ओर दौड़ लगा दी। दौड़ते-हांफते  हुए वह किसी तरह अस्पताल पहुंचा। बड़ी मशक्कत के बाद डॉक्टर ने उस बालक को बचा लिया एवं कुछ दिन अस्पताल में ही आराम करने कि सलाह दी। फिर हरिराम पुनः अपने जीवन में व्यस्त हो गया। जैसा कि समय कभी कह कर नहीं आता और हमें कभी नहीं भूलना चाहिए की हम भी समय के आधीन हैं। कुछ यूं हुआ कि, सेठ पुनः उस रास्ते से गुजर रहा था। रात अधिक हो गई थी। उसका ड्राईवर किसी कारणवश साथ में नहीं आ पाया था। तो सेठ अकेला ही गाड़ी चलाते हुए जा रहा था। तभी सामने से आते हुए अनियंत्रित ट्रक ने उसकी गाडी को टक्कर मार दी। सभी गांव वाले सड़क पर पहुंचे। पर किसी ने भी अस्पताल पहुंचाने कि हिम्मत नहीं कि। तभी हरिराम कि नजर उस सेठ पर पड़ी और उसने उसे पहचान लिया। 

तुरंत उसने कंधे पर रख कर सेठ को अस्पताल तक पहुंचाया। डॉक्टर ने कहा की खून की आवश्यकता है, सयोंग से ब्लड ग्रुप भी एक ही निकला। तुरंत हरिराम ने अपना खून दे दिया। सेठ के परिवार के सभी लोग इकट्ठे हुए। तभी सेठ को कुछ होश आया तो सामने हरिराम को देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया, कि यह वही व्यक्त्ति है। जिसकी मैंने मदद नहीं की थी और उसी ने आज मेरी जान बचाई। सेठ को अपने किये पर पछतावा हो रहा था। उसने प्रतिज्ञा की कि अब कभी भी अपनी गलती को नहीं दोहराएगा एवं आजीवन लोगों कि मदद करेगा। उसने हरिराम को भी अपने यहां रोजगार से लगा लिया।

हमेशा लोगों कि मदद करना चाहिए कभी भी ये विचार मन में नहीं लाना चाहिए कि अपना क्या जा रहा है या अपने साथ थोड़े ही हुआ है। ऐसा कोई आपको लेकर भी सोच सकता है, जब आप मुसीबत में हों।दूसरों की मदद करना ही मानव जीवन की सार्थकता है।

अगली भी अच्छी पिछ्ली भी अच्छी बीच वाली को जूता मारो


एक बार एक गांव में एक साधू आया और गांव के बाहर एक कुएं के पास एक वृक्ष के नीचे कुछ दिनों के लिए ठहर गया। तीन स्त्रियां वहां पर पानी भरने के लिए आईं, उसी समय साधू कुछ बड़बड़ा रहा था कि अगली भी अच्छी पिछली भी अच्छी बीच वाली को जूता मारो। ये सुन कर बीच में चल रही स्त्री को अपमान महसूस हुआ एवं बाकी दोनों स्त्रियां हँसने लगीं। पर स्त्री ने किसी से कुछ नहीं कहा। अगले दिन साधू फिर वही बड़बड़ा रहा था। उस दिन भी स्त्री ने कुछ नहीं कहा। पर उसके अगले दिन भी यही बात सुन कर उससे रहा नहीं गया तो उसने घर पर यह बात बताई यह सुनकर उसका पति गांव वालों के साथ साधू के पास पंहुचा एवं साधू से जानना चाहा कि वह इस तरह की बात क्यों कर रहा है। तो साधू ने कहा की आप लोग गलत समझ रहे हैं, मैं इस स्त्री को नहीं मनुष्य जीवन को लेकर यह बात कह रहा हूँ। में तो अपनी धुन में यह बात कहता रहता हूँ। किसी स्त्री के लिए नहीं कह रहा हूँ। मनुष्य जब बाल्यावस्था में होता है, तो वह चंचल एवं मन का साफ होता है। उसके मन में कोई भी छल-कपट नहीं होता। किन्तु जब वह वयस्क होता है, वह लालची एवं स्वार्थी हो जाता है। धन के लालच में वह कई तरह के गलत कार्य करता है एवं उसका मन अपवित्र हो जाता है। परन्तु जब वह वृद्धावस्था में कदम रखता है। पुनः छल-कपट से मुक्त हो कर ईश्वर के चरणों में जीवन अर्पण कर देता है। एवं पुनः मन पवित्र हो जाता है। अतः जीवन के जो बीच की अवस्था है, अर्थात यौवनावस्था यही मनुष्य को उसके मार्ग से भटकाती है। बहुत कम लोग ही इस अवस्था में अपने आप को संतुलित कर पाते है। यह अवस्था मनुष्य को भ्रमित करती है।

इसी लिए में कहता हूं, कि अगली भी अच्छी, पिछली भी अच्छी बीच वाली को जूता मारो। मतलब इस अवस्था में नियम एवं संयम से रहो। एवं गलत विचारों को दबा के रखो।

Sunday, 25 September 2016

ईश्वर चंद्र विद्यासागर



ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितम्बर 1820 में हुआ था। वे दार्शनिक, लेखक, अनुवादक और महान समाज सुधारक थे। अपनी उच्च कोटि की विद्वता के कारण ही उनको विद्यासागर कि उपाधि दी गई। विधवा पुनर्विवाह कानून 1856 को पारित करवाने में इनकी अहम् भूमिका थी। अपने इकलौते पुत्र का विवाह भी विधवा से कराकर उन्होंने समाज को जागरूक किया। बांग्ला पढ़ाने के लिए उन्होंने बंगाल में सैकड़ों रात्रिकालीन स्कूल भी स्थापित किए। संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए भी उन्होंने काम किया। उनका 29 जुलाई, 1899 को निधन हो गया।

अपने काम को कभी नहीं दोहराते सफल लोग



सफल लोगों में कुछ खास बातें होती हैं जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती हैं। वे बहुत कुछ करते हैं, लेकिन कई चीजों से तौबा भी करते जाते हैं कि यह काम भविष्य में फिर नहीं करेंगे। जैसे वे उन चीजों को फिर नहीं आजमाते जो एक बार असफल हो चुकी हैं। साथ ही जब भी कोई काम करते हैं तो कुछ सवाल उनके दिमाग के अवचेतन में होते हैं जैसे- मैं ये काम क्यों करूँगा? क्या यह मुझे शोभा देगा? क्या यह मैं लंबे समय तक कर सकता हूं, जब तक कि उद्देश्य पूरा न हो जाए? अगर इन सवालों का जवाब उन्हें नकारात्मक मिलता है तो वे उसे नहीं करते। वे सिर्फ खाना-पूर्ति के लिए कोई काम नहीं करते।ये लोग किसी को बदलने की कोशिश नहीं करते। वे उसे अपने तरीके से काम करने देते हैं, उसकी आजादी में दखल नहीं देते। और इसके जो भी अच्छे-बुरे परिणाम होते हैं वे उसे खुद ही अनुभव करने की आजादी देते हैं। यह तरीका एक तरह से उन्हें भी अपना काम पूरी आजादी से करने का मौका देता है। वे सभी को प्रशन्न करने की कोशिश नहीं करते। क्योंकि ऐसा हो नहीं सकता। एक बार जब वे किसी ऐसे काम को करने का फैसला कर लेते हैं जो सभी के फायदे का हो तो फिर ये नहीं सोचते कि इसे करने में कितनी मुश्किलों का सामना करना होगा। वे हमेशा लॉंगटर्म गोल और बेनिफिट के लिए शॉर्टटर्म या शुरूआती परेशानियां उठाने के लिए तैयार रहते हैं।

महत्वाकांक्षा भी बनती है श्रेष्ठ काम का जरिया


आप किसी काम को सर्वश्रेष्ठ तरीके से कब पूरा कर पाते हैं, जब  महत्वाकांक्षा होती है। यही सफलता का रास्ता होता है। महत्वाकांक्षाएं इंसान को सफल और महान बनाने में मदद करती हैं। इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि इसे इंसान खुद विकसित कर सकता है और यह जन्म से मिली खूबियां और कमियां उसे आगे ले जाती हैं। आगें बढ़ने की प्रेरणा बनती हैं। कुछ लोगों में टैलेंट जन्मजात होता है। लेकिन अगर उनमें एम्बिशन नहीं है तो यह टैलेंट निखर नहीं पाएगा और बेकार ही जाएगा। एम्बिशन एक प्रक्रिया के तहत इंसान को आगे बढ़ाता है। इसके साथ कुछ चीजें समय के साथ-साथ अपने आप आती जाती हैं। जैसे महत्वाकांक्षा ही सीखने की जिज्ञासा पैदा करती है। जिज्ञासा से ज्ञान, हुनर और खुशी आती है। सीखने के लिए कोशिश करनी होती है, काम करना पड़ता है, इससे अनुभव आता है। अनुभव से समझ विकसित होती है और डिसिप्लिन आता है। डिसिप्लिन से इंसान फोकस करना सीखता है, उसमें चीजों को देखने का नजरिया विकसित होता है। फोकस करने से समर्पण आता है। ध्यान भटकता नहीं है और इसी से क्रिएटिविटी आती है, इमेजिनेशन से क्षमता विकसित होती है। इमेजिनेशन से इनोवशन  आता है। इस तरह एम्बिशन अपने साथ कई गुण लाता है, जो किसी को भी सफलता की और ले जा सकता है।

Saturday, 24 September 2016

कैसे-कैसे फोबिया



फोबिया कोई बीमारी नहीं है बल्कि मनोविकार है। इसमें व्यक्त्ति को सामान्य चीजों से भी डर लगने लगता है। यह समस्या हर वर्ग के लोगों में उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो सकती है। मनोवैज्ञानिकों ने 400 अलग-अलग तरह के फोबिया के बारे में बताया है। जानते हैं कुछ अनोखे फोबिया के बारे में...

1.जिन लोगों को भीड़-भाड़ भरे स्थानों, बाजारों या बस-ट्रेन में सफर करने से डर लगता है, उन्हें Agoraphobia होता है।

2.जिनको ऊंचाई से बहुत डर लगता है। उन्हें एक्रोफोबिया होता है। ऐसे लोगों को ऊंची जगह पर पहुंचते ही पेनिक अटेक आ सकता है।

3. यदि घर में कोई नहाने से बचता है और बाथरूम में जाने से डरता है तो उसे अब्ल्यूटोफोबिया की समस्या हो सकती है।

4. कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें इंजेक्शन से इतना डर लगता है कि  वो डॉक्टर के पास जाने से कतराते हैं। इंजेक्शन से होने वाले डर को ट्राईपानोफोबिया कहते हैं।

5. डिसेंडोफोबिया की समस्या उन लोगों में होती है जो घर, ऑफिस या अन्य जगहों में सीढ़ी का उपयोग करने से बचते हैं। ऐसे लोगों को सीढ़ी चढ़ने और उतरने में डर लगता है।

सुबह उठने के बाद न करें ये 5 गलतियां



1. पानी न पीना... सुबह उठते ही एक गिलास  पानी न पीने से शरीर के विषाक्त पदार्थ ठीक से बाहर नहीं निकल पाते हैं। इससे डिहाइड्रेशन किडनी और लिवर संबंधी समस्या हो सकती है।


2. नाश्ता न करना... सुबह उठने के एक घंटे के अंदर नाश्ता न करने से एसिडिटी की प्रॉब्लम बढ़ने की आशंका रहती है। नाश्ता न करने पर बॉडी में एनर्जी की कमी भी हो जाती है, जिससे दिनभर कमजोरी भी महसूस होती है और जिसमे आप अपना काम पूरी ऊर्जा के साथ नहीं कर पाते।


3. मैसेज चेक करना... जो लोग सुबह उठते ही सबसे पहले फोन पर ई-मेल और मैसेज चैक करते हैं, ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। इससे स्ट्रेस हॉर्मोन ज्यादा रिलीज होते हैं। यूनिवर्सटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया की रिसर्च के मुताबिक इस कारण हाई बीपी की समस्या होने की आशंका बढ़ जाती है।

4. खाली पेट एक्सरसाइज करना... सुबह एक्सरसाइज करने के लिए बॉडी को एनर्जी की जरुरत होती है और वह तभी मिलेगी जब हम कुछ हेल्दी खाएं। अगर हम एकदम खाली पेट एक्सरसाइज करते हैं तो इससे मसल्स पर बुरा असर पड़ता है।


5. कॉफी पीना... सुबह उठते ही कॉफी पीने से कार्टिसोल हॉर्मोन का लेवल एकदम से बढ़ जाता है। इससे स्ट्रेस बढ़ने लगता है। कॉफी पीना ही है तो कुछ हल्का खाकर पिएं।

अपनी कॉफी का मजा लीजिए


कुछ छात्र पढ़ाई के बाद अपने कॅरियर में व्यवस्थित हो चुके थे। एक बार वे सब अपने पुराने प्रोफेसर से मिलने उनके घर गए। उनके बीच की बातचीत धीरे-धीरे जिंदगी और काम के तनाव की शिकायतों में बदल गई। छात्रों को प्रोफेसर ने कॉफी पीने के लिए कहा। थोड़ी देर बाद प्रोफेसर किचन में गए। एक बड़े पॉट में कॉफी और अलग-अलग तरह के कप लेकर आए। क्रिस्टल, चीनी मिट्टी, प्लास्टिक, सादे, महंगे, सस्ते, कई तरह के कप लेकर आये थे। हर छात्र के हाँथ में अब एक कप कॉफी थी। प्रोफेसर ने कहा, तुम लोगों ने इस बात पर गौर किया तुम सब के हाँथ में महंगे और खूबसूरत कॉफी के मग हैं। सब ने साधारण से दिखने वाले सस्ते कप को छोड़ दिया है। आप सब जिंदगी में सबसे अच्छा चाहते हैं, इसलिए ये तनाव है। कप कॉफी की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं कर सकता है। फिर भी सबसे सुंदर चुना। इसी तरह जीवन कॉफी है और नौकरी, पैसा, पद और समाज कप के समान हैं। ये सिर्फ जीवन में शामिल हैं। जीवन की गुणवत्ता को बदल नहीं सकते हैं। फिर भी कभी-कभी हम कप पर केंद्रित हो जाते हैं और ईश्वर ने हमें जो कॉफी दी है, उसका स्वाद लेने में असफल हो जाते हैं।

निष्कर्ष: 
खुश रहने वाले लोगों के पास सब कुछ सबसे अच्छा हो यह जरुरी नहीं है। उनके बस में जो है वह उसे सबसे अच्छा करने का प्रयास करते हैं।

मन का सौंदर्य तन से बढ़कर है


महाकाव्य 'मेघदूत' के रचयिता कालिदास से राजा विक्रमादित्य ने एक दिन अपने दरबार में पूछा,' क्या कारण है, आपका शरीर मन और बुद्धि के अनुरूप नहीं है? इसके उत्तर में कालिदास ने अगले दिन दरबार में सेवक से दो घड़ों में पानी लाने को कहा। वह पानी से भरा एक स्वर्ण का और एक मिट्टी का घड़ा ले आया।

अब महाकवि ने राजा से विनयपूर्वक पूछा, 'महाराज' आप कौन से घड़े का पानी पीना पसंद करेंगे? विक्रमादित्य ने कहा, कवि महोदय यह भी कोई पूछने की बात है? इस ज्येष्ठ मास की तपन में सबको मिट्टी के घड़े का ही जल भाता है।' कालिदास मुस्कराकर बोले, तब तो महाराज, आपने अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं ही दे दिया।' राजा समझ गए कि जिस प्रकार जल की शीतलता बर्तन की सुंदरता पर निर्भर नहीं करती, उसी प्रकार मन-बुद्धि का सौंदर्य तन की सुंदरता से नहीं आँका जाता।

मन का सौंदर्य मनुष्य को महान बना देता है और उसका सर्वत्र सम्मान होता है।

Friday, 23 September 2016

ईमानदारी जरुरी



एक सेठ शहर में किसी बड़े जमींदार से मिलने के लिए आए। उनका मकसद जमींदार से जमीन का एक बड़ा सौदा करना था। ट्रेन से उतरकर उन्होंने रेलवे स्टेशन से जमींदार के घर तक के लिए टैक्सी कर ली। टैक्सी वाले ने उन्हें जमींदार के घर तक पहुंचा दिया। सेठ ने जमींदार को पैसे देने के लिए ब्रीफकेस ढूढ़ा तो ब्रीफकेस था ही नहीं। सेठ के चहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। तभी टैक्सी का चालक दरवाजे पर ब्रीफकेस लेकर आ गया। सेठ  की जान में जान आई। उसने टैक्सी चालक से पूछा- इसमें कई लाख रूपए थे। तुम्हारा मन नहीं डोला? टैक्सी चालक बोला-नहीं  , बेइमानी का मौका सबको मिलता है। मैंने इसे नहीं लिया। आज इसे रख लेता तो सभी टैक्सी वाले बदनाम हो जाते। यह नुकसान कही बड़ा होता। सेठ को उसकी यह बात छू गई।
 

मंजिल तक पंहुचा देगा एक कदम



लक्ष्य तय कर लेना बहुत आसान है। खुद को सफल होते देखने के सपने देखना भी आसान है। अगर कुछ मुश्किल है तो इस लक्ष्य की दिशा में ले जाने वाला पहला कदम उठाना। लेकिन यह भी सच है कि जब तक आप यह पहला कदम नहीं उठाते, तब तक लक्ष्य तक पहुँचने की दौड़ में रफ्तार नहीं आ सकती। आज जानिए उन तरीकों के बारे में, जो आपको लक्ष्य की दिशा में बढ़ने में जरुरी 'पुश' दे सकते हैं।

खुद से जंग छोड़ें :

अपने आप को कमतर आंकते रहकर हम अपने लक्ष्य की दिशा में पहला कदम नहीं उठा पाते। इससे होता यह है कि आप अपने आप से कहते रहते हैं कि आप फलां काम अच्छे से न कर पाओ। इन सबसे उबरें। इसके बाद ही आपको पता चल पाएगा कि आपकी वास्तिवक क्षमताएं क्या हैं? इसलिए यह जंग छोड़ें।

एक छोटा कदम:

बेशक कोई बड़ा प्रोजेक्ट सामने होने पर घबराहट होना सामान्य है। लेकिन इस घबराहट को हटाकर कॉन्फिडेन्स लाने का एक ही तरीका है। प्रोजेक्ट को कई हिस्सों में तोड़कर उसके सबसे छोटे हिस्से को पूरा करने के लिए कदम बढ़ाएं। विश्वास बढेगा।

मनाइए जश्न:

हर फील्ड में सफलता के ऊंचे से ऊंचे पैमाने तय हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आप हर बार खुद को उससे तौलते रहें। आपको जो भी छोटी-बड़ी सफलता मिले, उसका जश्न मनाएं। फिर अगली बार कुछ नया, कुछ बड़ा करने का लक्ष्य रखें। इस तरह से आपको अपना मानक ऊपर करते जाने का अवसर भी मिलेगा और साहस भी।

◆लक्ष्य के बारे में सिर्फ सोचते रहने वालों और उस दिशा में एक भी कदम न उठाने वालों को सफलता कभी नहीं मिलती।

जरा सी देर हमारा बना बनाया खेल बिगाड़ सकती है


लंदन की चर्चित मिनिस्ट्री में सर एडवर्ड टॉमस निर्माण एवं यातायात मंत्री थे। एक बहुत बड़े निर्माण कार्य को संपन्न कराने के लिए उनके विभाग ने टेंडर निकाले। टेंडर भरने वालों में सर टॉमस का एक सहपाठी भी था। वह टॉमस से मिला। टॉमस ने कहा- 'तुम सारी औपचारिकताएं पूरी कर दो, मैं तुम्हारे टेंडर पास कराने का पूरा प्रयास करूँगा, पर कार्य समय पर पूरा होना चाहिए।'

सर टॉमस कड़ाई से समय का पालन करते थे। सहपाठी प्रसन्न हो गया। उसका टेंडर मंजूर हो गया। सर टॉमस ने उसे फोन पर सूचित किया कि वह आदेश-पत्र ले जाए, जिसके लिए दोपहर एक बजे का समय निश्चित हुआ।

मित्र सर टॉमस के कार्यालय पहुँचा। उस समय घड़ी में एक बजकर दो मिनट हो चुके थे। सर टॉमस अपने कार्यालय में मौजूद थे, उन्हें मित्र के आने की सुचना मिली। उन्होंने घड़ी की ओर देखा और इंटरकॉम पर अपने पी.ए. को सूचना दी- उनसे कहिये, उनका टेंडर रिजेक्ट हो गया है।' यह सुनते ही मित्र घबड़ा गया। उसने रिसेप्शन से ही फोन किया और उनसे बोला,' डियर फ्रेंड क्या बात हो गई? पहले स्वीकृत, अब अस्वीकृत!'

'कुछ बात नहीं टेंडर नामंजूर हो गया।

'मगर क्यों? आपने तो कहा था कि...

'कहा था लेकिन तुम समय पर कार्य पूरा नहीं कर सकोगे'- सर टॉमस ने कहा।
'सर, मे हर हालात में काम पूरा करूँगा।'

'मुझे विश्वास है, तुम नहीं करोगे। तुमने एक बजे का समय दिया था, दो मिनट लेट हो। जाहिर है, तुम समय पर कार्य पूरा नहीं करोगे।'

और फोन का रिसीवर रख दिया।
जरा सी देर के कारण मित्र को गोल्डन चांस गंवाना पड़ा और वह निराश हो कर लौट गया।

निष्कर्ष:

जिस व्यक्त्ति की दृष्टि में समय की कीमत नहीं है, वह बात का धनी नहीं होता है, क्योंकि उसका जीवन अव्यवस्थित रहता है और वह अपने कार्य को समय पर कभी पूरा नहीं कर सकता। उसका जीवन 'असफल' कहलाता है।

जीवन से मत भागो, जिओ उद्देश्य के लिए


घटना उन दिनों की है जब इंग्लैंड में डॉक्टर एनी बेसेंट अपने वर्तमान जीवन के प्रति निराश थीं और एक सार्थक जीवन जीने की ललक उनके ह्रदय में तीव्रता से उठी थी। एक दिन अँधेरी रात्रि सभी परिजन गहरी नींद में सोये हुए थे। केवल वही जाग रहीं थीं और आत्मशांति के लिए इतनी बैचेन हो उठीं कि इस जीवन से भाग जाने का ख्याल मन में लाकर सामने रखी जहर की शीशी लेने के लिए चुपके से उठीं, लेकिन तभी किसी दिव्य-शक्ति की आवाज ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया- क्यों, जीवन से दर गईं? सत्य की खोज करो।' यह सुनकर वह चोंक गईं,' अरे यह आवाज किसकी है? कौन मुझे भागने से रोक रहा है? उन्होंने उसी समय निश्चय कर लिया- सार्थक जीवन के लिए मुझे संघर्ष करना ही होगा।'

सत्य की खोज के लिए वे अपना परिवार, सुख-संपत्ति आदि सब कुछ छोड़कर भारत आ गईं। उन्होंने साध्वी जैसे जीवन यहाँ ग्रहण किया और विश्व को भारतीय जीवन-दर्शन के रंग देना ही अपना मुख्य उद्देश्य बना लिया। उनकी मृत्यु भारत में हुई थी।

निष्कर्ष:

अंधकार से प्रकाश की ओर जाने के लिए भी मनुष्य को संघर्ष करना पड़ता है, जिसके दौरान वह अपनी शुद्ध चेतना से समर्पण-भाव को जाग्रत कर जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता है। ऐसे संघर्षवान व्यक्त्ति की ईश्वर सहायता करता है, बशर्ते वह सच्ची लगन व उत्साह के साथ सार्थक जीवन के प्रति संकल्पकृत है और उसकी निगाह निर्धारित लक्ष्य पर केंद्रित हैं।

हार की जीत

रचनाकार: सुदर्शन

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे 'सुल्तान' कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रूपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। "मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा", उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, "ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।" जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।

खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, "खडगसिंह, क्या हाल है?"
खडगसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "आपकी दया है।"
"कहो, इधर कैसे आ गए?"
"सुलतान की चाह खींच लाई।"
"विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।"
"मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।"
"उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!"
"कहते हैं देखने में भी बहुत सुँदर है।"
"क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।"
"बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।"
बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से। उसने सैंकड़ो घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, "परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?"
दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायु-वेग से उडने लगा। उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, "बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।"
बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रति क्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज़ आई, "ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।"
आवाज़ में करूणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, "क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?"
अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, "बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।"
"वहाँ तुम्हारा कौन है?"
"दुगार्दत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।"
बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था।बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, "ज़रा ठहर जाओ।"
खड़गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।"
"परंतु एक बात सुनते जाओ।" खड़गसिंह ठहर गया।
बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, "यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड़गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।"
"बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल घोड़ा न दूँगा।"
"अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।"
खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, "बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?"
सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, "लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।" यह कहते-कहते उन्होंने सुल्तान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।
बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, "इसके बिना मैं रह न सकूँगा।" इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दे। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।
रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन भर का भारी बना दिया। वे वहीं रूक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठपर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। फिर वे संतोष से बोले, "अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।"

Wednesday, 21 September 2016

निरर्थक चर्चा में खर्च न करें समय


भगवान बुद्ध, अनमोल समय के सदुपयोग के पक्षधर थे। निकम्मी बातों में समय गंवाने का सदा विरोध किया करते थे। कोई आदमी उनके पास आया और बोला, भगवान आप बार-बार दुःख और विमुक्ति पर ही बोलते हैं। कृपया यह तो बताइए यह दुःख होता किसको है? और दुखों से विमुक्ति होती किसको है?

प्रश्न करने वाले का प्रश्न निरर्थक था। पर बुद्ध कहां ऐसी निरर्थक चर्चा में उलझने वाले थे। वह प्रेमपूर्वक बोले भाई तुम्हें प्रश्न करना ही नहीं आता है। प्रश्न यह नहीं करना चाहिए था कि दुःख किसे होता है। तुम्हें प्रश्न करना चाहिए था कि दुःख क्यों होता है? और विमुक्त कैसे होते हैं?

सार्थक बात यह है कि दुःख से छुटकारा पाएं और इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि दुःख का कारण क्या है? और उसका निवारण क्या है? इसे छोड़ सभी चर्चाएं व्यर्थ होती हैं। यह सब निरर्थक नहीं तो और क्या है।

तभी बुद्ध से कोई पूछता है कि भगवान यह बताएं कि संसार को किसने बनाया है? तो फिर वह प्यार से समझाते हैं कि किसी विष  बुझे तीर से घायल व्यक्त्ति कभी नहीं पूछता कि उसे किसने बनाया है। बेहतर है कि उस तीर को निकाल लिया जाए तो पीड़ा से मुक्त होकर इलाज कराया जाए। तभी वह दुःख मुक्त हो सकता है।

इंसान के पास जिंदगी में बहुत कम समय है अगर वह फिजूल की बातों में यूं ही गंवा देगा तो कुछ हासिल नहीं कर सकता। इसलिए निरर्थक बातों से बचना चाहिए। इसी में समझदारी है।

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला पैदा हो गया, जो सांप तो क्या, किसी भी जानवर से लड़ना नहीं चाहता था। सभी नेवलों में यह बात फैल गई। आखिरकार एक ...