राजा भोज एक दिन भोजन कर रहे थे कि तभी एक मधुमक्खी उनके पास आकर बैठ गई। और आदतन अपने हाँथ-पैर रगड़ते हुए, उन्हें सिर पर लगाने लगी। भोज ने राजपुरोहित से पूछा, 'यह ऐसा क्यों कर रही है? राजपुरोहित ने जबाब दिया, 'राजन, यह कह रही है कि आप जैसे लक्ष्मीपतियों को धन संचय नहीं करना चाहिए। मैंने भी कितनी मेहनत से अपने छत्ते में शहद एकत्रित किया। मगर मैं उसका उपयोग नहीं कर पायी और न ही किसी को दान दिया। इसे दूसरों ने लूट लिया। आप भी अपने धन का सदुपयोग करते हुए दान देना प्रारम्भ करें।' राजा भोज ने इस बात को काफी गंभीरता से लिया। वह उसी दिन से विद्धवान और निर्धन लोगों को खुलकर दान करने लगे। उनकी इस उदारता से चिंतित होकर राज्य के कोषाध्यक्ष ने राजकोष के द्वार पर लिखवा दिया, राजा को आपातकाल के लिए धन सुरक्षित रखना चाहिए।' जब राजा भोज की उस पंक्ति पर नजर पड़ी तो उन्होंने उसके नीचे लिखवा दिया, 'जिन पर लक्ष्मी की कृपा हो उन पर विपत्ति कैसी?' कोषाध्यक्ष ने फिर लिखवा दिया, 'कभी-कभी दुर्भाग्य से धनवानों पर भी विपत्ति आ सकती हैै।' भोज ने इसे पढ़कर लिखवाया, 'यदि दुर्भाग्य से धनवानों पर विपत्ति आ सकती है तो एकत्र किया हुआ धन भी नष्ट हो सकता है।' राजा भोज के इस तर्क का कोई उत्तर कोषाध्यक्ष को नहीं सूझा। उस दिन से उसने कुछ भी लिखवाना बंद कर दिया। दान का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आगे भी चलता रहा।
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