जब संधि का प्रस्ताव असफल हो गया तो श्रीकृष्ण हस्तिनापुर लौट चले, तब महारथी कर्ण " श्रीकृष्ण " को सीमा तक छोड़ने आए। रास्ते में कर्ण को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने कहा-'कर्ण तुम सूतपुत्र नहीं हो। तुम तो महाराजा पांडु और देवी कुंती के सबसे बड़े पुत्र हो। यदि दुर्योधन का साथ छोड़ दो और पांडवों के साथ आ जाओगे तो तत्काल तुम्हारा राज्याभिषेक हो जाएगा।'
यह सुन कर कर्ण ने कहा-'वासुदेव, मैं जानता हूँ कि मैं माता कुंती का पुत्र हूँ, किन्तु जब सभी लोग मिल कर मुझे सूतपुत्र कहकर मेरा तिरस्कार कर रहे थे, तब केवल दुर्योधन ने मुझे सम्मान दिया। मेरे भरोसे ही उसने पांडवों को चुनौती दी है। अब क्या उसके उपकारों को भूलकर मैं उसके साथ विश्वासघात करूँ? ऐसा करके क्या मैं अधर्म का भागी नहीं बनूंगा? मैं यह भी जानता हूँ कि युद्ध में विजय पांडवों की होगी। आप मुझ को मेरे कर्तव्य से बिमुख कर रहे हैं।
कर्तव्य के प्रति कर्ण की निष्ठा ने श्रीकृष्ण को निरुत्तर कर दिया।
इस प्रसंग में कर्तव्य के प्रति निष्ठा व्यक्त्ति के चरित्र को दृढ़ता प्रदान करती है और उस दृढ़ता को बड़े से बड़ा प्रलोभन भी उसकी निष्ठा को डिगा नहीं पाता।

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