Sunday, 30 October 2016

आखिर लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू क्यों है?


भगवान विष्णु की प्रिय लक्ष्मी जी सदैव गरुण वाहन पर ही धार्मिक कृत्य होने पर अपने भक्तों के यहाँ जाती हैं। परन्तु यदि कोई व्यक्त्ति सतमार्ग छोड़कर सिर्फ लक्ष्मी जी का ही ध्यान करता है, अर्थात साम-दाम- दण्ड-भेद से ही सिर्फ लक्ष्मी जी का ध्यान करता है। तो ऐसा व्यक्त्ति चरित्रहीन हो कर श्रीहीन हो जाता है। ऐसे में लक्ष्मी जी अकेले ही उल्लू पर विराजमान हो कर उस व्यक्त्ति के यहाँ पहुँचती हैं। गरुण जी भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी के परम पुनीत वाहन हैं। उल्लू अमंगल कारक पक्षी है। जबकी गरुण जी सर्व अमंगल नाशक हैं।
जहाँ पर जप, पूजा-पाठ, देव-पित्र, कर्म, दान-पुण्य, अतिथि सत्कार इत्यादि होते हैं। वहाँ लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के साथ गरुण वाहन पर सवार हो कर जाती हैं। और जहाँ पाप, अनाचार, दुर्व्यवहार, अत्याचार आदि हों तथा मुकदमेबाजी और गलत कामों में पैसे खर्च हों तो समझ लें की लक्ष्मी जी उल्लू पर सवार हो कर आई हैं।

उल्लू कैसे बना लक्ष्मी जी का वाहन:-प्राणी जगत की रचना करने के बाद एक रोज सभी देवी-देवता विचरण करने के लिए धरती पर आए। उन्हें घूमते हुए देख पशु-पक्षियों ने जाकर कहा की आप लोगों ने हमें बनया इस लिए हम आपका धन्यवाद करते हैं। कृपया आप लोग हमको अपना वाहन बनाएं।

तभी सभी देवी-देवता अपनी पसंद से पशु-पक्षियों का चुनाव करने लगे। जब लक्ष्मी जी की बारी आई तो सभी पशु-पक्षियों में होड़ मच गई की मैं इनका वाहन बनूंगा। और लड़ाई-झगड़ा होने लगा। तभी लक्ष्मी जी ने कहा कि में आज नहीं अब कार्तिक अमावस्या को आउंगी क्यों की मैं हर साल उसी दिन धरती पर आती हूँ। तभी मैं अपना वाहन आप लोगों में से किसी एक को बना लुंगी। कार्तिक अमावस्या के दिन सभी पशु-पक्षी लक्ष्मी जी का इन्तजार करने लगे। बहुत देर तक वो नहीं आईं। रात को जब वो आईं तो उल्लू ने अपनी तेज नजर से उनको देख लिया और पहले पहुँच कर विनती करने लगा। लक्ष्मी जी ने देखा तो आस-पास में कोई भी दूसरा पशु-पक्षी नहीं था। उन्होंने उल्लू का आग्रह खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। तभी से लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू है।

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