कभी-कभी हम बहुत सी ऐसी परिस्थितियों से गुजरते हैं। जहाँ हमको लगता है, कि माता-पिता हमको डाँटते क्यों हैं,पीटते क्यों हैं। घर के बड़े बुजुर्ग इतना समझाते क्यों हैं,शिक्षक हमको समझाते क्यों हैं, दंड क्यों देते हैं। अच्छे मित्र या पड़ोसी या फिर रिश्तेदार इतना समझाते क्यों हैं। कभी-कभी हमको उनका बोलना भी बुरा लगने लगता है, और प्रतिक्रिया स्वरूप हम उनके समक्ष या पीठ पीछे उनके लिए अपशब्दों का इस्तमाल करने लगते हैं,जो की बहुत ही गलत है। इसको हम इस कहानी के माध्यम से समझ सकते हैं।
एक पिता अपने बच्चे को शाम के समय पतंग उड़ाना सिखा रहा था। बच्चा आश्चर्य से यह सब देख रहा था। एवं जिज्ञासा पूर्वक पतंग की ओर देख रहा था। पतंग बहुत ही ऊंचाई पर पहुँच गई। और हिचकोले खाने लगी। तभी बच्चे ने अचानक से कहा कि पिताजी पतंग की डोर काट दीजिये जिससे यह और ऊपर उड़ने लगेगी। तभी पिता ने उसकी बात मानते हुए पतंग की डोर काट दी। पतंग तुरंत ही अनियंत्रित हो कर नीचे गिरने लगी और दूर जाकर जमीन पर गिर गई। फिर बच्चे को पिता ने समझाया कि पतंग जब तक ही हवा में उड़ सकती है जब तककि डोर अपने हाँथ में है। जैसे ही डोर अलग होगी पतंग जमीन पर आ गिरेगी। इसी तरह अपना जीवन है, जब तक हम रिश्तों की डोर से बंधे हुए हैं, तभी तक हम सफल हैं। घर,परिवार,माता-पिता,पडोसी,रिश्तेदार,मित्र सभी मिल कर हमको इस डोर से बांध कर रखते हैं। जिस तरह पतंग डोर को तोड़ और ऊपर जाना चाहती है, उसी तरह हम भी सभी रिश्तों-नातों को छोड़ कर और ऊंचाई पर जाना चाहते हैं। पर हम जिस ऊंचाई पर होते हैं, वो इन लोगों के सहयोग से ही संभव है। यह बात नहीं भूलना चाहिए।
हम भी पतंग की तरह आजाद होना चाहते हैं। हमको लगने लगता है कि हमारी प्रगति में ये रिश्ते-नाते बाधक हैं। जिस दिन ऐसा लगने लगे समझो अपना हाल भी कटी पतंग की तरह ही होगा।

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