Tuesday, 18 October 2016

जीवन की भागदौड़


एक शिक्षक एक बार कक्षा में छात्रों को पढ़ा रहा था। अचानक से उसने छात्रों की परीक्षा लेने की सोची, उसने छात्रों से कहा-सभी अपने-अपने नाम की पर्चियां बना लें। सभी ने तुरंत पर्चियां बना लीं। फिर शिक्षक ने उन पर्चियों को एक डिब्बे में ड़ालने को कहा सभी ने वैसा ही किया। फिर शिक्षक ने कहा की अब आप अपने-अपने नाम की पर्चियां फिर से उठा लें। सभी तुरंत अपनी-अपनी पर्चियों को उठाने के लिए दौड़ पड़े। परन्तु जल्दी खुद की पर्ची ढूढ़ने के चक्कर में किसी को भी खुद के नाम की पर्ची नहीं मिल पा रही थी। बहुत समय तक परेशान होने के बाद शिक्षक ने कहा। चलो अब एक काम करो जिसके भी नाम की पर्ची आप लोगों को मिल रही है,उस व्यक्त्ति को वापस कर दो। सभी ने ऐसा ही किया, कुछ समय में ही सभी को अपने-अपने नाम की पर्चियां मिल गईं।

फिर शिक्षक ने समझाया कि, जिस तरह हम खुद की पर्ची ढूंढ रहे थे। पर वह हम को मिल नहीं रही थी। और जैसे ही जिसके भी नाम की पर्ची हमको मिली हमने उसको वापस कर दी,जिसमे कम समय में ही सभी के नाम की पर्ची सभी को मिल गई।

ठीक इसी तरह, हम जीवन की भाग-दौड़ में खुद के लिए अकेले ही भागते रहते हैं, फिर भी खुद के लिए खुशियाँ नहीं ढूढ़ पाते। अगर हम मिलकर काम करें और मिलकर एक दूसरे का सुख-दुःख बांटे तो खुश रहना बहुत आसान हो जाएगा।

आप खुश रहना चाहते हैं तो कोशिश करें दूसरे लोग आप से खुश हों।

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