Saturday, 22 October 2016

भक्तों के कृष्ण



एक दिन बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा- तुम्हारे धर्म ग्रंथों में यह लिखा है कि भक्त की गुहार सुनकर श्रीकृष्ण जी पैदल दौड़े चले आए थे। न ही कोई सेवक साथ लिया नहीं कोई सवारी। क्या वजह थी, क्या उनके यहाँ कोई सेवक नहीं था? बीरबल ने कहा, इसका उत्तर आपको समय आने पर ही बता सकता हूँ जहाँपनाह।
कुछ दिन बाद बीरबल ने एक सेवक को मोम की बनी हुई मूर्ती दी। जो की बिलकुल बादशाह अकबर के पोते से मिलती-जुलती थी। बीरबल ने सेवक को समझा दिया की जिस तरह तुम रोज बादशाह अकबर के पोते को बाग़ में घुमाने ले जाते हो, ठीक उसी तरह ले जाना और सरोवर के पास पैर फिसल जाने का बहाना करना। साथ ही मूर्ती पानी में गिरे यह जरूर ध्यान देना। अगर तुमने ऐसा ही किया तो तुम को इनाम दिया जायेगा। बादशाह बाग़ में बैठे हुए थे तभी अचानक से आवाज सुनकर चौंक गए देखा तो सेवक सरोवर के पास गिरा हुआ था। और पानी में पोते की मोम की मूर्ती को गिरता हुआ देखा तो वो समझ ही नहीं पाये की मूर्ती है। पोते को पानी में गिरता हुआ समझ कर घबराते हुए, उन्होंने तुरंत दौड़ लगा दी और सरोवर के पास पहुँच गए। तभी पानी में से मूर्ती लेकर बीरबल निकले तो बादशाह कुछ समझपाते इससे पहले ही बीरबल ने बोला- जिस तरह आप नंगे पैर दौड़ पड़े आपने सोचा की आपका पोता पानी में गिर गया। जबकि आपके पास सेवकों की कोई कमी नहीं है। ठीक इसी तरह श्रीकृष्ण भी भक्तों को संकट में देख कर दौड़े चले आते हैं।

No comments:

Post a Comment

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला पैदा हो गया, जो सांप तो क्या, किसी भी जानवर से लड़ना नहीं चाहता था। सभी नेवलों में यह बात फैल गई। आखिरकार एक ...