Wednesday, 26 October 2016

ईश्वर या धन आप को क्या चाहिए?



एक राजा था उसको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इस उपलक्ष्य में उसने अपने महल में एक आयोजन रखा। प्रजा में घोषणा करवा दी की कल उपहार स्वरुप राजदरबार में रखी हुई जिस वस्तु को पहले जो छुएगा वो उसको प्रदान की जाएगी। प्रजा उत्सव के दिन का इंतजार करने लगी। सभी उत्साहित थे, कोई सोच रहा था कि मैं तो कीमती सामन पे हाँथ रखूँगा। कोई कह रहा था कि मैं तो सोने के कलश पे हाँथ रखूँगा। किसी को घोड़े का शौक था। बस सभी रात भर यही सोचते रहे कि कल कौन सी वस्तु को प्राप्त करना है। सबके मन में डर भी था कि कहीं उससे पहले पहुँच कर कोई उसकी पसन्दीदा वस्तु को न हाँथ लगा दे।
सुबह दरबार के खुलते ही राजा ने सभी लोगों का राज दरबार में स्वागत किया। सभी जैसे ही दरबार में पहुचे दरबार का माहौल अजीब हो गया। सभी इधर-उधर दौड़ रहे थे। सभी डरे हुए थे कि ऐसा न हो की कोई हमारी पसंद की वस्तु को हाँथ लगा दे?
राजा सिंहासन पर बैठ कर सबकुछ देख रहा था और आनंदित हो रहा था। अचानक एक छोटा सा बच्चा उसकी और बढ़ा और उसने राजा को हाँथ लगा दिया। इस तरह अब राजा उसका हो गया, और उसकी हर चीज उस बच्चे की हो गई।
ठीक इसी तरह जैसे राजा ने जनता को मौका दिया, हमको भी ईश्वर मौका देता है कुछ पाने का। लेकिन हम ईश्वर की बनाई हुई चीजों को पाने में अपना समय और शक्ति लगा देते हैं। किसी को गाड़ी चाहिए तो किसी को बंगला, किसी को पैसा तो किसी को शोहरत। रोज प्रार्थना में भी ईश्वर से चीजें ही मांगते हैं।
जो लोग सत्य को समझ लेते हैं। वह ईश्वर को ही मांगते हैं। ईश्वर के ही हो जाते हैं। ईश्वर की प्रार्थना मात्र से ही उसकी बनाई हुई वस्तुएं भी प्राप्त हो जाती हैं।

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