आषाढ़ माह की गर्म दोपहर थी। भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ भ्रमण पर जा रहे थे। चारों तरफ रेत ही रेत बिखरी हुई थी। रेत पर चलने के कारण तथागत के पैरों के निशान बनते जा रहे थे। उसी रास्ते से एक ज्योतिषी भी अपने घर जा रहे थे। उन्होंने रेत पर बुद्ध के पैरों के निशान देखे और देखते ही रह गए। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। ज्योतिषी ने ऐसे पदचिन्ह पहले कभी नहीं देखे थे। ज्योतिषी ने सोचा शायद यह पदचिन्ह किसी चक्रवर्ती सम्राट के हो सकते हैं। लेकिन सामने जब उन्होंने बुद्ध को देखा तो उन्हें यकीन नहीं हुआ क्योंकि यह पदचिन्ह एक सन्यासी व्यक्ति के थे।
बुद्ध के चेहरे पर एक चमकती कांति थी। ज्योतिष ने हाँथ जोड़ कर निवेदन किया कि आपके पैरों में जो पद्म हैं, वह अति दुर्लभ हैं। हमारी ज्योतिष विद्या कहती है कि आपको चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए, परंतु आप तो? भगवान बुद्ध हंसे और कहा,' आपका यह ज्योतिष काम करता था। अब मैं सब बंधनों से मुक्त हो गया हूँ। जब आप सारे बंधनों से मुक्त हो जाते हैं तो न कोई ज्योतिष और न कोई विद्या काम करती है। बस रहता है तो ईश्वर का परमतत्व ज्ञान और मोक्ष प्राप्ति का रास्ता। बुद्ध का यह प्रसंग इसी बात को इंगित करता है।

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