Tuesday, 4 October 2016

बोलने का प्रभाव


एक राजा अपने अनुचरों के साथ वन विचरण के लिए निकला। मार्ग में उसे तीव्र प्यास लगी। राजा ने देखा कि पास ही एक झोपड़ी थी, जिसके पास पानी का एक मटका रखा था। राजा ने एक अनुचर को उसमे से पानी लाने को कहा।

राजाज्ञा पाकर अनुचर वहाँ गया और झोपड़ी में रहने वाले अंधे व्यक्त्ति से बोला, अरे,ओ अंधे!एक गिलास पानी दे।' अंधा व्यक्त्ति बोला' तुझ जैसे सिपाही को मैं पानी नहीं पिलाऊंगा।' और वह खाली हाँथ लौट आया। राजा ने दूसरे अनुचर को भेजा तो उसने वैसा ही व्यवहार किया। 'तुझ जैसे सेनानायक को मैं पानी नहीं पिलाऊंगा।' वह भी खाली हाँथ लौट आया। जब दोनों खाली हाँथ लौट आए, तब राजा स्वयं उस अंधे व्यक्त्ति के पास पहुंचा और विनम्रतापूर्वक प्रणाम कर बोला,'महानुभाव, मुझे बड़ी तेज प्यास लगी है, गला सूखा जा रहा है। आपकी बड़ी कृपा होगी, मुझे एक गिलास पानी पिला दें।

उस अंधे व्यक्त्ति ने राजा को सम्मानपूर्वक अपने निकट बैठाकर कहा,'आप जैसे विनयशील लोगों का ही राजा तुल्य सम्मान उचित है। आपके लिए पानी तो क्या, शरीर को भी समर्पित कर सकता हूँ। उसने राजा को पानी पिलाया। जब राजा तृप्त हो गया, तब उसने उस अंधे व्यक्त्ति से पूछा,'महाशय, आपने मुझसे पहले आए उन दोनों को कैसे पहचाना कि उनमें एक सिपाही व एक सेनानायक था और आपने राजा के रूप में मुझे कैसे पहचाना?' अंधा व्यक्त्ति बोला,'बोलने के तरीके से किसी भी व्यक्त्ति का स्तर स्वतः ही निर्धारित हो जाता है।

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