एक व्यक्त्ति का पुत्र कक्षा में प्रथम आया, यह खबर सुनते ही पुरे घर में खुशी का माहोल बन गया। पुत्र के प्रथम आने की खुशी में उस व्यक्त्ति ने पुत्र की तारीफ में कहा, बेटा तू महान बनेगा, बड़ा अधिकारी बनेगा,घर का नाम रोशन करेगा,सभी रिश्तेदारों,पड़ोसियों को भी उत्साह पूर्वक बताया। माँ ने भी उस दिन बहुत से पकवान बनाये, भगवान का शुक्रिया किया। उपहार स्वरुप उस बालक को एक साईकल ला कर दी। यह सब घटनाक्रम उनकी पुत्री के सामने ही चल रहा था। उसने भी ठान लिया की अगले वर्ष वह भी प्रथम आएगी। अगले वर्ष जैसा की उसने ठान लिया था, वह भी कक्षा में प्रथम आई। परन्तु इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जैसा की उसको उम्मीद थी। उसके मन में हलचल हुई। आंदोलित हो कर उसने अपनी माँ से पूछ ही लिया। माँ क्या आप लोग मेरी सफलता से खुश नहीं हो। माँ ने कहा नहीं बेटी तुझ को ऐसा क्यों लग रहा है। तो पुत्री ने कहा पिछली बार भैया प्रथम आया था तो उसको आप लोगों ने उपहार स्वरूप साईकल ला कर दी थी। परन्तु मुझको कुछ भी नहीं दिया। तभी माँ ने कहा अरे ऐसा नहीं है, बेटी तुझ को सभी उपहार तेरी शादी में मिलेंगे। ऐसा कह कर माँ अपने काम में लग गई। ये दोहरी मानसिकता माँ-बाप में अभी भी है, इसको बदलना जरुरी है।
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सांपों के देश में एक ऐसा नेवला
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