चंद्रमा हर 81,000 साल बाद खुद का फेस बदलता रहता है। ऐसा क्षुद्रग्रह (एस्टेरॉयड) व धूमकेतु (कॉमेट) की लगातार बमबारी के कारण होता है। इसका पता नासा के लूनर प्रोब मिशन से मिले चित्रों से चला है। पूर्व के अनुमानों के मुकाबले बदलाव की यह रफ़्तार सौ गुना से भी ज्यादा है। एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी व कॉर्नेल विश्वविद्यालय के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के शोध यह से यह जानकारी सामने आई है।
क्षुद्रग्रह व धूमकेतु की बमबारी से चंद्रमा की सतह पूरी तरह बदल जाती है। इस प्रक्रिया के कारण बने क्रेटर का अध्ययन करने से यह रहस्य खुला। क्रेटर और वहां के नमूनों से क्रेटर के बनने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिली है। इसके बनने की दर और आकाशीय पिंडों के सतह से टकराने के बारे में अब भी ठोस जानकारी नहीं मिल सकी है।
पृथ्वी पर क्षुद्रग्रहों व उल्काओं के गिरने से बदलाव होते हैं लेकिन पृथ्वी की मोटी सतह इसके असर को कम कर देती है। पृथ्वी पर रोजाना हजारों टन मिट्टी अपनी दिशा बदलती है और बारिश से मिट्टी का कटाव होता है। पृथ्वी की तुलना में चंद्रमा में ऐसा सम्भव नहीं है। इसलिए रूप को बदलने में इतना समय लग जाता है।
नासा के एलआरओ प्रोब मिशन में लगे हाई रिजोल्यूशन कैमरे से ली गई तस्वीरों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है। चंद्रमा की सतह पर 222 नए क्रेटर का पता चला है। इनमें से 33 फीसदी का व्यास दस मीटर है।

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