Tuesday, 18 October 2016

सब्र का फल


एक बार गौतम बुद्ध विश्व भ्रमण पर थे। उनके साथ उनके शिष्य भी थे। एक बार पैदल भ्रमण करते हुए बुद्ध एक गांव में से होकर गुजर रहे थे। कुछ देर आराम करने की सोच कर रुक गए। तभी उनको तीव्र प्यास लगी, तो उन्होंने अपने एक शिष्य को पानी लाने के लिए भेजा। शिष्य गांव में पूछते हुए पास की एक नदी तक पहुँच गया। वहां उसने देखा की नदी के किनारे कुछ लोग कपडे धो रहे हैं एवं स्नान कर रहे हैं। शिष्य ने सोचा ऐसा गन्दा पानी तो में नहीं ले जा सकता सोच कर वापिस चला गया। उसने बुद्ध को सारी बात बताई की वह पानी क्यों नहीं लाया। परन्तु बुद्ध को तीव्र प्यास लगी थी इस लिए उन्होंने दूसरे शिष्य को भेजा। दूसरा शिष्य कुछ समय पश्चात पानी ले कर आ गया। बुद्ध ने पूछा तुम कहाँ से पानी ले आये। नदी का पानी तो गन्दा था। शिष्य ने कहा मैंने कुछ समय तक लोगों के जाने का इंतजार किया। कुछ समय बाद पानी की गंदगी नीचे बैठ गई। पानी के साफ होते ही मैंने पानी भर लिया। बुद्ध ने कहा, इसी तरह हमारा जीवन होता है। सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं। जैसे पानी में उथल-पुथल होते ही वह गन्दा हो जाता है। और कुछ समय पश्चात वह पुनः साफ हो जाता है। इसी तरह दुःख कुछ समय पश्चात चला जाता है। धैर्य का धारण करने वाले व्यक्ति पानी की तरह निर्मल हो जाते हैं।

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