राजा भोज एक दिन भोजन कर रहे थे कि तभी एक मधुमक्खी उनके पास आकर बैठ गई। और आदतन अपने हाँथ-पैर रगड़ते हुए, उन्हें सिर पर लगाने लगी। भोज ने राजपुरोहित से पूछा, 'यह ऐसा क्यों कर रही है? राजपुरोहित ने जबाब दिया, 'राजन, यह कह रही है कि आप जैसे लक्ष्मीपतियों को धन संचय नहीं करना चाहिए। मैंने भी कितनी मेहनत से अपने छत्ते में शहद एकत्रित किया। मगर मैं उसका उपयोग नहीं कर पायी और न ही किसी को दान दिया। इसे दूसरों ने लूट लिया। आप भी अपने धन का सदुपयोग करते हुए दान देना प्रारम्भ करें।' राजा भोज ने इस बात को काफी गंभीरता से लिया। वह उसी दिन से विद्धवान और निर्धन लोगों को खुलकर दान करने लगे। उनकी इस उदारता से चिंतित होकर राज्य के कोषाध्यक्ष ने राजकोष के द्वार पर लिखवा दिया, राजा को आपातकाल के लिए धन सुरक्षित रखना चाहिए।' जब राजा भोज की उस पंक्ति पर नजर पड़ी तो उन्होंने उसके नीचे लिखवा दिया, 'जिन पर लक्ष्मी की कृपा हो उन पर विपत्ति कैसी?' कोषाध्यक्ष ने फिर लिखवा दिया, 'कभी-कभी दुर्भाग्य से धनवानों पर भी विपत्ति आ सकती हैै।' भोज ने इसे पढ़कर लिखवाया, 'यदि दुर्भाग्य से धनवानों पर विपत्ति आ सकती है तो एकत्र किया हुआ धन भी नष्ट हो सकता है।' राजा भोज के इस तर्क का कोई उत्तर कोषाध्यक्ष को नहीं सूझा। उस दिन से उसने कुछ भी लिखवाना बंद कर दिया। दान का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आगे भी चलता रहा।
Monday, 31 October 2016
लोहे को घुन खा गया!
एक बार की बात है दो व्यक्त्ति थे, जिनका नाम मामा और फूफा था। दोनों साथ में ही व्यापार करते थे। एक दिन मामा ने फूफा से कहा की क्यों न हम कोई ऐसी चीज खरीदें जिसको कुछ दिन रखने के बाद महंगे दामों में बेच दें, दोनों सहमत हो गए। फिर सोचा की ऐसा क्या सामान खरीदा जाए। तभी लोहा खरीदने पर दोनों सहमत हो गए। फिर सोचा की इसको रखे कहाँ। तभी मामा को याद आया की उसके पास एक कबाड़खाना है। वहीँ रख देते हैं, दोनों ने लोहे को वहीँ रख दिया।
कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीक रहा। कुछ समय बाद मामा ने बेईमानी से थोड़ा-थोडा लोहा बेचना चालू कर दिया। आखिर में कुछ भी लोहा नहीं बचा। एक दिन फूफा ने मामा से कहा की अभी लोहे क रेट ठीक है, क्यूं न हम कुछ लोहा बेंच दें। लेकिन मामा तो पहले ही पूरा लोहा बेच चूका था। उसने फूफा से कहा की लोहे में तो घुन लग गई है। फूफा को पूरा माजरा समझ में आ गया। उसने मामा से उस समय कुछ नहीं कहा और अपने घर चला गया। कुछ दिन बाद फूफा ने मामा से कहा की भाई में एक बहुत ही बड़ी शादी में जा रहा हूँ। क्यूं न तुम्हारे लड़के को भी साथ ले जाऊं, उसका भी घूमना हो जायेगा और मेरे को भी साथ मिल जाएगा। कल सुबह हम वापस आ जायेंगे। मामा ने कहा ठीक है, इसको ले जाओ और ठीक से खाना भी खिलवा देना। फूफा और लड़का शादी के लिए निकल गए। दो दिनों तक जब लड़का घर नहीं आया तो मामा को चिंता हुई। वह फूफा के घर गया और पूछा की मेरा लड़का कहाँ है। तभी फूफा ने कहा की लड़के को तो रास्ते में चील उठा ले गई। मामा ने कहा की भला चील कैसे बच्चे को उठा के ले जा सकती है। वह रोते-रोते राजा के पास पहुंचा, और आप बीती राजा को सुनाई। राजा ने फूफा से कहा की इसके लड़के को वापस क्यूं नहीं कर रहे। तो फूफा ने भी अपनी आप बीती सुनाई की लोहे को घुन कैसे खा सकता है। राजा ने पूरा माजरा समझ कर दोनों को आदेश दिया की फूफा लड़के को वापस करे और मामा,'फूफा के लोहे को।' इस तरह दूध का दूध और पानी का पानी हो गया।
Sunday, 30 October 2016
आखिर लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू क्यों है?
भगवान विष्णु की प्रिय लक्ष्मी जी सदैव गरुण वाहन पर ही धार्मिक कृत्य होने पर अपने भक्तों के यहाँ जाती हैं। परन्तु यदि कोई व्यक्त्ति सतमार्ग छोड़कर सिर्फ लक्ष्मी जी का ही ध्यान करता है, अर्थात साम-दाम- दण्ड-भेद से ही सिर्फ लक्ष्मी जी का ध्यान करता है। तो ऐसा व्यक्त्ति चरित्रहीन हो कर श्रीहीन हो जाता है। ऐसे में लक्ष्मी जी अकेले ही उल्लू पर विराजमान हो कर उस व्यक्त्ति के यहाँ पहुँचती हैं। गरुण जी भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी के परम पुनीत वाहन हैं। उल्लू अमंगल कारक पक्षी है। जबकी गरुण जी सर्व अमंगल नाशक हैं।
जहाँ पर जप, पूजा-पाठ, देव-पित्र, कर्म, दान-पुण्य, अतिथि सत्कार इत्यादि होते हैं। वहाँ लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के साथ गरुण वाहन पर सवार हो कर जाती हैं। और जहाँ पाप, अनाचार, दुर्व्यवहार, अत्याचार आदि हों तथा मुकदमेबाजी और गलत कामों में पैसे खर्च हों तो समझ लें की लक्ष्मी जी उल्लू पर सवार हो कर आई हैं।
उल्लू कैसे बना लक्ष्मी जी का वाहन:-प्राणी जगत की रचना करने के बाद एक रोज सभी देवी-देवता विचरण करने के लिए धरती पर आए। उन्हें घूमते हुए देख पशु-पक्षियों ने जाकर कहा की आप लोगों ने हमें बनया इस लिए हम आपका धन्यवाद करते हैं। कृपया आप लोग हमको अपना वाहन बनाएं।
तभी सभी देवी-देवता अपनी पसंद से पशु-पक्षियों का चुनाव करने लगे। जब लक्ष्मी जी की बारी आई तो सभी पशु-पक्षियों में होड़ मच गई की मैं इनका वाहन बनूंगा। और लड़ाई-झगड़ा होने लगा। तभी लक्ष्मी जी ने कहा कि में आज नहीं अब कार्तिक अमावस्या को आउंगी क्यों की मैं हर साल उसी दिन धरती पर आती हूँ। तभी मैं अपना वाहन आप लोगों में से किसी एक को बना लुंगी। कार्तिक अमावस्या के दिन सभी पशु-पक्षी लक्ष्मी जी का इन्तजार करने लगे। बहुत देर तक वो नहीं आईं। रात को जब वो आईं तो उल्लू ने अपनी तेज नजर से उनको देख लिया और पहले पहुँच कर विनती करने लगा। लक्ष्मी जी ने देखा तो आस-पास में कोई भी दूसरा पशु-पक्षी नहीं था। उन्होंने उल्लू का आग्रह खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। तभी से लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू है।
Friday, 28 October 2016
चुहिया का विवाह
एक बाज ने चुहिया को पंजे में जकड़ लिया। एक तपस्वी की उस पर नजर पड़ गयी। उन्हें चुहिया पर दया आ गई और उन्होंने अपने तप के प्रभाव से चुहिया को कन्या का रूप दे दिया। वह उसे साथ लेकर अपने आश्रम पर आ गए। तपस्वी की पत्नी ने पूछा तो तपस्वी ने उसे सारी बात बता दी। दोनों पुत्री की तरह कन्या का पालन-पोषण करने लगे। कुछ दिनों बाद कन्या युवती हो गई तो तपस्वी ने पत्नी से कहा, ' मैं इस कन्या का विवाह सूर्य से करना चाहता हूँ। तपस्वी ने सूर्य भगवान का आव्हान किया। परंतु लड़की ने कहा, ' इनका स्वभाव तो बहुत गरम है। जो इनसे उत्तम हो, उसे बुलाइए।' लड़की की बात सुन कर सूर्य ने बादल का सुझाव दिया। लड़की ने कहा, ' यह तो काले रंग का है। कोई इससे उत्तम वर हो तो बताइए।' तपस्वी ने फिर वायु देवता का आव्हान किया। वायु को देखकर लड़की ने कहा, ' वायु है तो शक्तिशाली, पर चंचल बहुत है। यदि कोई इससे अच्छा हो तो उसको बुलाइए।' अब बुलाए गए पर्वतराज। पर्वत के आने पर लड़की ने कहा, ' पर्वत तो बहुत कठोर है। किसी दूसरे वर की खोज कीजिए।' तपस्वी ने पर्वत से पूछा, ' पर्वतराज, तुम अपने से श्रेष्ठ किसे मानते हो?' पर्वत ने कहा, ' चूहे मुझसे भी श्रेष्ठ होते हैं। वे मेरे शरीर में भी छेद कर देते हैं।' तपस्वी ने चूहों के राजा को बुलाया और पुत्री से प्रश्न किया, ' क्या तुम इसे पसंद करती हो? लड़की चूहे को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और उससे विवाह करने को तैयार हो गई। वह बोली, ' पिताजी, आप मुझे फिर से चुहिया बना दीजिए। मैं इनसे विवाह करके आनन्दपूर्वक रह सकुंगी।' तपस्वी ने उसे फिर से चुहिया बना दिया।
Thursday, 27 October 2016
राक्षस पर श्री कृष्ण और बलराम की जीत
एक बार श्री कृष्ण और बलराम एक जंगल से हो कर गुजर रहे थे। रात बहुत हो चुकी थी इसलिए उन्होंने रात को जंगल में ही विश्राम करने की योजना बनाई। श्री कृष्ण ने बलराम से कहा कि ऐसा करते हैं कि आप और में बारी-बारी से सो जाते हैं। पहले मैंं सो जाता हूँ और आप पहरा दीजिए फिर आप सो जाएंगे तो मैं पहरा दूंगा। दोनों सहमत हो गए। एक वृक्ष के नीचे श्री कृष्ण सो गए और बलराम पहरा देने लगे। तभी अचानक से एक राक्षस प्रकट हुआ और जोर से चिल्लाया। आवाज सुन कर बलराम डर गए। जैसे ही वो डरे उनके शरीर का आकार छोटा हो गया और राक्षस के शरीर का आकार बड़ा हो गया। तभी राक्षस दोबारा चिल्लाया उसके शरीर का आकार और चीख सुन कर बलराम और डर गए। जिससे राक्षस के शरीर का आकार और बढ़ गया और बलराम के शरीर का आकार और छोटा हो गया। अब तो बलराम इतना डर गए की श्री कृष्ण को बिना बताए डर की वजह से उनसे चिपक कर लेट गए। और आँख बंद कर ली, और कब नींद लग गई पता ही नहीं चला। तभी श्री कृष्ण की नींद खुली और राक्षस कुछ समय के लिए गायब हो गया। थोड़ी देर बाद श्री कृष्ण को भी वही आवाज आई और राक्षस प्रकट हुआ। श्री कृष्ण उससे बिलकुल भी भयभीत नहीं हुए।
उन्होंने ने राक्षस से कहा यहाँ क्यों आए हो चले जाओ यहाँ से। यह सुन कर राक्षस के शरीर का छोटा हो गया। और श्री कृष्ण के शरीर का आकार बढ़ गया। राक्षस को लगा की यह बालक तो मुझ से डर ही नहीं रहा। वह और जोर से चिल्लाया लेकिन फिर वही हुआ। जितना वो चिल्लाता उतना ही वह शरीर से छोटा होता जा रहा था और श्री कृष्ण बड़े होते जा रहे थे। अंत में उसके शरीर का आकार इतना छोटा हो गया कि श्री कृष्ण ने उसको उठा कर अपनी धोती से एक गठान में बांध लिया और सो गए। सुबह जब श्री कृष्ण और बलराम उठे तो रास्ते में बलराम ने रात की घटना का जिक्र किया तभी श्री कृष्ण ने धोती की गठान की तरफ इशारा करते हुए कहा कि कहीं तुम इसकी बात तो नहीं कर रहे। बलराम ने कहा हाँ पर रात को तो यह बहुत बड़ा था और धीरे-धीरे और बड़ा होते जा रहा था। तभी श्री कृष्ण हंस दिए और पूरी घटना बताई और दोनों आगे की और बढ़ चले।
इसी तरह हमारी जिंदगी में भी बहुत सी कठिनाईयां आती हैं। जितना हम उनसे डरते हैं या दूर भागने की कोशिश करते हैं वह उतना ही विकराल रूप लेती जाती हैं। अतः कठिन परिस्थितियों का डट कर मुकाबला करना चाहिए। आखिर में जीत अपनी ही होगी। और ये सौ प्रतिशत सत्य हैं।
Wednesday, 26 October 2016
ईश्वर या धन आप को क्या चाहिए?
एक राजा था उसको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इस उपलक्ष्य में उसने अपने महल में एक आयोजन रखा। प्रजा में घोषणा करवा दी की कल उपहार स्वरुप राजदरबार में रखी हुई जिस वस्तु को पहले जो छुएगा वो उसको प्रदान की जाएगी। प्रजा उत्सव के दिन का इंतजार करने लगी। सभी उत्साहित थे, कोई सोच रहा था कि मैं तो कीमती सामन पे हाँथ रखूँगा। कोई कह रहा था कि मैं तो सोने के कलश पे हाँथ रखूँगा। किसी को घोड़े का शौक था। बस सभी रात भर यही सोचते रहे कि कल कौन सी वस्तु को प्राप्त करना है। सबके मन में डर भी था कि कहीं उससे पहले पहुँच कर कोई उसकी पसन्दीदा वस्तु को न हाँथ लगा दे।
सुबह दरबार के खुलते ही राजा ने सभी लोगों का राज दरबार में स्वागत किया। सभी जैसे ही दरबार में पहुचे दरबार का माहौल अजीब हो गया। सभी इधर-उधर दौड़ रहे थे। सभी डरे हुए थे कि ऐसा न हो की कोई हमारी पसंद की वस्तु को हाँथ लगा दे?
राजा सिंहासन पर बैठ कर सबकुछ देख रहा था और आनंदित हो रहा था। अचानक एक छोटा सा बच्चा उसकी और बढ़ा और उसने राजा को हाँथ लगा दिया। इस तरह अब राजा उसका हो गया, और उसकी हर चीज उस बच्चे की हो गई।
ठीक इसी तरह जैसे राजा ने जनता को मौका दिया, हमको भी ईश्वर मौका देता है कुछ पाने का। लेकिन हम ईश्वर की बनाई हुई चीजों को पाने में अपना समय और शक्ति लगा देते हैं। किसी को गाड़ी चाहिए तो किसी को बंगला, किसी को पैसा तो किसी को शोहरत। रोज प्रार्थना में भी ईश्वर से चीजें ही मांगते हैं।
जो लोग सत्य को समझ लेते हैं। वह ईश्वर को ही मांगते हैं। ईश्वर के ही हो जाते हैं। ईश्वर की प्रार्थना मात्र से ही उसकी बनाई हुई वस्तुएं भी प्राप्त हो जाती हैं।
Tuesday, 25 October 2016
द्रष्टीकोण
एक बार एक व्यक्त्ति अपने 28 वर्षीय पुत्र के साथ ट्रेन में सफर कर रहा था। अचानक से पुत्र जोर से चिल्ला कर बोला, पापा वो देखो पेड़ पीछे की तरफ भाग रहे हैं। पिता मुस्कुराया और पास मे ही एक अन्य व्यक्त्ति था। उसको आश्चार्य हुआ की इतना बड़ा लड़का कैसी बातें कर रहा है। तभी थोड़ी देर बाद पुत्र फिर उत्सुकता से बोला वो देखो पापा बादल उड़ रहे हैं। अब उस व्यक्त्ति से रहा नहीं गया। दूसरे व्यक्त्ति ने पिता से कहा इसे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाइए। तभी पिता ने उस व्यक्त्ति से कहा कि आप गलत समझ रहे हैं। दरअसल बात यह है कि इसने आज ही देखना शुरू किया है। यह बचपन से अँधा था। आज ही इलाज के बाद इसकी आँखे यह सब देख पा रही हैं।
तभी साथ में बैठे व्यक्त्ति को अपने बोलने पर थोड़ा अफसोस हुआ। और वो भी उस लड़के के साथ नए द्रष्टीकोण से देखने लगा।
कभी-कभी हम भी बिना सोचे-समझे इस तरह बर्ताव कर बैठते हैं। सभी का जीवन अलग-अलग परिस्थियों से गुजरता है। जरुरी नहीं है, हम जो सोचते हैं वही सही हो।
ऐसे थे राम भक्त हनुमान
एक बार माता सीता ने हनुमान जी से प्रसन्न होकर हीरे से जड़ा हुआ हार दिया। और साथ में बाकी सभी सेवकों को भी भेंट स्वरुप मोतियों का हार प्रदान किया। हनुमान जी ने तुरंत हीरों के हार में से हीरे अलग-अलग कर दिए। और उनको दांतों से चबा कर जमीन पर फेंकने लगे। माता सीता ने यह देखा तो वो बहुत क्रोधित हुईं। उन्होंने हनुमान जी से कहा, आपने इतने कीमती हार के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
हनुमान जी बोले, माता मेरा यह उद्देश्य नहीं था। मैं तो बस देखना चाह रहा था की इसमें मेरे प्रभु राम और माता सीता बसते हैं कि नहीं। अगर ऐसा नहीं है, तो यह हीरों का हार मेरे लिए व्यर्थ है। सेवक भी यह घटनाक्रम देख रहे थे। उन्होंने हनुमान से पूछा, अगर श्री राम और माता सीता इन निर्जीव हीरों के हार में नहीं हैं। तो कौन सी ऐसी जगह है, जहाँ श्री राम और माता सीता बसते हैं। हनुमान जी ने तुरंत अपनी छाती चीर दी, तभी सामने खड़े सेवकों और माता सीता को हनुमान जी के ह्रदय में श्री राम और माता सीता के दर्शन हुए।
Monday, 24 October 2016
कुत्ता भी समझता है जीवन की नैतिकता
एक बार एक व्यक्त्ति अपने मित्र के साथ जंगल के रास्ते पास के गांव की और जा रहा था। शाम होने को थी, तभी उसको कुत्ते के भौकने की आवाज आई। कुत्ता शिकारी के जाल में फंसा हुआ था। व्यक्त्ति ने सोचा की इसको जाल से आजाद कर दिया जाए। वह जाल के पास जैसे ही पहुंचा। कुत्ता और जोर-जोर से घुर्राने और भौंकने लगा। उसके मित्र ने मना किया रहने दो इसको इसके हाल पे ही छोड़ दो नहीं तो ये काट लेगा। फिर भी व्यक्त्ति ने कोशिश करके कुत्ते को आजाद कर दिया। व्यक्त्ति के हाँथ में थोडा सा घाव भी हो गया था। फिर दोनों गांव की और चल दिए। कुछ दिनों के बाद व्यक्त्ति का पुनः जंगल में से गुजरना हुआ। इस बार वह अकेला ही था। तभी पीछे से अचानक दो व्यक्त्ति आए और उसको घेर लिया। वो दोनों डांकु थे,उन्होंने धक्का दे कर उस व्यक्त्ति से कहा कि जो कुछ भी कीमती सामान है हमारे हवाले कर दो। तभी कुत्ता आसपास ही था, आवाज सुन कर व्यक्त्ति को पहचान लिया। कुत्ता दोनों डांकुओं पर टूट पड़ा और उनको बुरी तरह जख्मी कर दिया। दोनों डांकु जान बचा कर भाग खड़े हुए। व्यक्त्ति ने कुत्ते को दुलार किया और दोनों खुशी-खुशी अपने-अपने रास्ते चल दिए। इस तरह निस्वार्थ सेवा भाव ने व्यक्त्ति को डांकुओं से बचाया।
निस्वार्थ की गई सेवा या मदद् ही इंसान को सही मायने में इंसान बनाती है। जानवर भी इंसान से निस्वार्थ प्रेम करते हैं।
Sunday, 23 October 2016
एक वृक्ष जिसने देखा संपूर्ण महाभारत युद्ध - वेदव्यास
महाबली भीम के पुत्र घटोत्कक्च के पुत्र बरबरीक ने अपनी अखण्ड तपस्या से ख़ामख्या देवी से 3 अजय बाण(तीर) प्राप्त किये जो की संसार में कोई भी बरबरीक को परास्त नहीं कर सकता था। इस विषय में श्री कृष्ण को पूर्व से ही ज्ञात था। महाभारत युद्ध आरम्भ होने के पूर्व श्री कृष्ण बरबरीक के पास जाते हे जहाँ बरबरीक एक वृक्ष के नीचे अपनी ध्यान आसान में लीन होता हे। उसके समक्ष पहुँच कर उन तीनो बाणों को के बारे में जानना चाहते हे जो बरबरीक ने ख़ामख्या देवी से प्राप्त किये हे।
श्री कृष्ण बरबरीक से वार्तालाप में उन तीर का चमत्कार देखना चाहते हे जो उनको ख़ामख्या देवी से प्राप्त हुए किन्तु इनका प्रयोग तो केवल शत्रु को चिन्हित कर प्रयोग किया जाता हे। इस सन्दर्भ में श्री कृष्ण बरबरीक को वृक्ष को शत्रु समझ वाण चलाने का आदेश देते हे। श्री कृष्ण की आज्ञानुसार बरबरीक के वाण वृक्ष के प्रत्येक पत्ते को डाल से काट देते हे लेकिन एक पत्ता श्री कृष्ण अपने पैर के नीचे रख देते हे। जो की वाण सीधा श्री कृष्ण के पैर में आ कर चुभता हे।
इस पर बरबरीक श्री कृष्ण को सावधान रहने के लिए भी बोलते हे जो की वाण ने श्री कृष्ण के पैर में घाव का मुँह खोल दिया अब इस पर कोई भी वाण लगा तो प्राण संकट में आ सकते हे।
इन वाणों के प्रयोग के बाद श्री कृष्ण बरबरिक से अन्य वरदान के बारे में पूछते हे तब बरबरीक कहते हे की जो भी सेना दुर्बल होगी उसके पक्ष में युद्ध करेंगे।
यह वरदान महाभारत युद्ध को एक चुनोती थी यदि बर्बरीक पांडव सेना पक्ष में युद्ध करते तो कौरव सेना कमजोर होती जाती। जैसे ही कौरव सेना कमजोर होती बरबरीक कौरव सेना पक्ष में युद्ध करते। तो इस प्रकार युद्ध का अंत होना संभव नही था। इस प्रसंग में पाण्डव वंश की विजय के लिए -
श्री कृष्ण ने बरबरीक को अपना शिष्य मानकर उससे अपना सिर गुरु दक्षिणा में माँगा परंतु बरबरीक की इक्च्छा थी की बो महाभारत का युद्ध देखना चाहते हे। इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए श्री कृष्ण ने बरबरीक के सिर को पेड़ पर रख दिया जिससे बो महाभारत के सम्पूर्ण युद्ध को देख सके। उस वृक्ष ने संपूर्ण महाभारत युद्ध देखा जिस पर बर्बरीक का सिर रखा गया।
वेदव्यास जी द्वारा रचित महाभारत काव्य में इस वृक्ष तथा बरबरीक का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया हे।
क्या सचमुच घर में कैंसर उगा रहे हैं हम?
वास्तव में कैंसर क्या है? एक सूक्ष्मतम कोशिका का असामान्य व्यवहार। ये किसी भी कारण से हो सकता है लेकिन कुछ कारण हम स्वयं पैदा करते हैं। कैंसर से डरते तो सब हैं लेकिन उसके होने के कारणों या सोर्स को नजरअंदाज करते हैं। रोजमर्रा के जीवन में हम दर्जनों केमिकल्स और आर्टिफिशियल चीजों का उपयोग करते हैं जो कहीं न कहीं कैंसर का कारण बन सकती है।
कैन पैक्ड वस्तुएं:
कैन में विसफिनल नामक प्लास्टिक की परत है। प्लास्टिक में मौजूद बीपीए हार्मोंस के असंतुलन से ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर की सम्भावना बढ़ जाती है। बीपीए से बाँझपन और पॉली सिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम हो सकता है।
फल-सब्जी:
गंदे नालों के पानी से सब्जी-फल पैदा किए जा रहे हैं। अच्छी पैदावार के लिए इन्सेक्टीसाइड्स, पेस्टिसाइड्स और केमिकल फर्टिलाइजर्स का अत्यधिक इस्तेमाल हो रहा है। डीडीटीए नाइट्रेट और फास्फेट खेतों में डाला जा रहा है। ये सब कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं।
नॉन स्टिक बर्तन:
इन बर्तनों की कोटिंग से कम तेल से खाना अवश्य पक जाता है पर यह कोटिंग पॉली टेट्राफ्लूरोएथिलीन से की जाती है। एनवायरोमेंट वर्किंग ग्रुप के अनुसार नॉन स्टिक बर्तनों से निकलने वाला धुंआ गर्भवती महिलाओं के लिए नुकसानदेह है और रोग प्रतिरोधक क्षमता घटाता है।
इनमें अल्काइन फिनॉल, ट्राईक्लोसन और टेट्राफ्लूरोएथिलीन रसायन हैं। ये हार्मोन और एंडोक्राइन सिस्टम को प्रभावित करते हैं और हार्मोन का संतुलन बिगाड़ देते हैं। इस रसायनों से ब्रेस्ट और प्रोटेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
पावडर, बॉडी लोशन, लिपस्टिक, डियोड्रेंट और स्प्रे आदि ट्राईक्लोसन, पराबेन्स जैसे रसायनों से बनते हैं जो हार्मोंस को प्रभावित कर कैंसर की सम्भावना बढ़ाते हैं।
माइक्रोवेव से पका या गर्म किया गया खाना लंबे समय तक खाने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है हालाँकि इस तथ्य पर शोध हो रहा है।
डेंगू-चिकनगुनिया के बाद जिका हुआ सक्रिय
जिका वायरस के लक्षण:
डेंगू, चिकनगुनिया और यलो फीवर जैसे लक्षण वाले जिका वायरस से पीड़ित व्यक्त्ति को बुखार आता है। स्किन में रेशेस होती है, कंजक्टिवाइटिस, मसल्स और ज्वाइंट पेन, बेचैनी और सिरदर्द होता है। दो से सात दिन तक इसका असर रहता है। जिका वायरस इन्फेक्टेड मच्छरों के काटने से होता है। एडीज मच्छर सामन्यतः दिन में काटते हैं।
उपचार व बचाव:
यह ऐसे क्रिटिकल रोग नहीं हैं जिसके लिए विशेष उपचार लेना पड़े। मरीज आराम करें, तरल पदार्थ खूब पिएं, बुखार और दर्द की सामान्य दवाएं लें। एक सप्ताह में आराम न हो तो विशेष उपचार करवाएं। मच्छरों के काटने से बचने के लिए शरीर को अधिकतम कवर करने वाले कपडे पहनें। दरवाजों और खिड़कियों पर विंडो स्क्रीन लगाकर रखें। मच्छरदानी में सोएं या इन्सेक्ट रिपेलेंट्स का इस्तेमाल करें। घर के आसपास बकेटस, ड्रम्स, गमलों और टायरों को साफ रखें। उनमें पानी इकट्ठा न होने दें। बूढ़े और बीमार लोग या ज्यादा यात्रा करने वाले मच्छरों से बचाव पर ज्यादा ध्यान दें। इस रोग में दवा के साथ बचाव के उपचार ज्यादा प्रभावी साबित होते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आगाह किया है कि भारत में भी जिका वायरस पहुँच चूका है। यह एडिज मच्छरों से फैलने वाला फीवर है जो बंदरों से मनुष्य तक पहुंचा है। सन् 1947 में इस फ्लेवी वायरस को युगांडा के बंदरों में सबसे पहले पहचाना गया था। यह रोग वहां मनुष्यों को हुआ और अफ्रीका और अमरीका होते हुए एशिया तक फैल गया।
Saturday, 22 October 2016
भक्तों के कृष्ण
एक दिन बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा- तुम्हारे धर्म ग्रंथों में यह लिखा है कि भक्त की गुहार सुनकर श्रीकृष्ण जी पैदल दौड़े चले आए थे। न ही कोई सेवक साथ लिया नहीं कोई सवारी। क्या वजह थी, क्या उनके यहाँ कोई सेवक नहीं था? बीरबल ने कहा, इसका उत्तर आपको समय आने पर ही बता सकता हूँ जहाँपनाह।
कुछ दिन बाद बीरबल ने एक सेवक को मोम की बनी हुई मूर्ती दी। जो की बिलकुल बादशाह अकबर के पोते से मिलती-जुलती थी। बीरबल ने सेवक को समझा दिया की जिस तरह तुम रोज बादशाह अकबर के पोते को बाग़ में घुमाने ले जाते हो, ठीक उसी तरह ले जाना और सरोवर के पास पैर फिसल जाने का बहाना करना। साथ ही मूर्ती पानी में गिरे यह जरूर ध्यान देना। अगर तुमने ऐसा ही किया तो तुम को इनाम दिया जायेगा। बादशाह बाग़ में बैठे हुए थे तभी अचानक से आवाज सुनकर चौंक गए देखा तो सेवक सरोवर के पास गिरा हुआ था। और पानी में पोते की मोम की मूर्ती को गिरता हुआ देखा तो वो समझ ही नहीं पाये की मूर्ती है। पोते को पानी में गिरता हुआ समझ कर घबराते हुए, उन्होंने तुरंत दौड़ लगा दी और सरोवर के पास पहुँच गए। तभी पानी में से मूर्ती लेकर बीरबल निकले तो बादशाह कुछ समझपाते इससे पहले ही बीरबल ने बोला- जिस तरह आप नंगे पैर दौड़ पड़े आपने सोचा की आपका पोता पानी में गिर गया। जबकि आपके पास सेवकों की कोई कमी नहीं है। ठीक इसी तरह श्रीकृष्ण भी भक्तों को संकट में देख कर दौड़े चले आते हैं।
Thursday, 20 October 2016
बंदर का डर
एक बार एक व्यक्ति ने परिक्षण के उद्देश्य से कुछ बंदरों को एक पिंजड़े में छोड़ दिया। फिर उस पिंजड़े के कौन में एक सीढ़ी लगा दी और उस सीढ़ी के ऊपर एक केला बांध दिया। बंदरों ने केला देखा तो सभी उस और भागे। एक बंदर सीढ़ी पर चढ़ने में कामयाब हुआ जैसे ही वह केले के पास पहुंचा, उस व्यक्ति ने बंदर पर ठंडा पानी डाल दिया। बंदर उचक कर दूर जा भागा। फिर उस व्यक्त्ति ने सभी बंदरों पर ठंडा पानी डाल दिया। सभी बंदर डर गए। कुछ देर बाद फिर एक बंदर ने सीढ़ी पर चढ़ने की कोशिश की, व्यक्ति ने पुनः बंदर पर पानी डाल दिया और उसके बाद सभी बंदरों पर पानी डाल दिया। इसके बाद कोई भी बंदर सीढ़ी पर चढ़ता तो व्यक्ति इस घटना को दोहरा देता। कुछ समय बाद बंदर समझ गए की अगर सीढ़ी पर चढ़ेंगे तो सभी पर ठंडा पानी डाल दिया जाएगा। अब जैसे ही कोई बंदर सीढ़ी पर चढ़ने की कोशिश करता, बाकी के बंदर आक्रामक हो कर उस बंदर की पिटाई कर देते। ऐसा कई बार हुआ फिर बंदरों ने सीढ़ी पर चढ़ने का प्रयास ही छोड़ दिया। अब बिना पानी डाले ही बंदर सीढ़ी से दूर बैठ गए। फिर उस व्यक्ति ने पिंजड़े के एक बंदर को बाहर निकाला और उसके बदले में दूसरे नए बंदर को रख दिया। उसने जैसे ही केला देखा झट से सीढ़ी पर चढ़ गया। अचानक से बाकी सभी बंदरों ने नए बंदर की पिटाई कर दी। नया बंदर कुछ समझ ही नहीं पाया और उसने भी सीढ़ी से दूरी बना ली। फिर व्यक्ति ने एक-एक करके सभी बंदरों को पिंजड़े से बाहर निकाला और उनके बदले में नए बंदरों को रखता गया। सभी यही कर रहे थे, जैसे ही कोई सीढ़ी के पास जाता सभी बंदर मिल कर उस बंदर की पिटाई कर देते। अब पिंजड़े में सभी नए बंदर थे। उनको नहीं पता था की वो ऐसा क्यों कर रहे हैं। बस कोई भी बंदर सीढ़ी पर चढ़ता तो बाकी के बंदर उसकी पिटाई कर देते। इस तरह कुछ समय बाद किसी भी बंदर ने सीढ़ी पर चढ़ने का प्रयास नहीं किया। नए बंदरों पर किसी भी प्रकार का ठंडा पानी नहीं डाला गया था। फिर भी वो पुराने बंदरों का किया दोहरा रहे थे।
इसी तरह हम भी अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े हुए हैं। इन कुरीतियों और अंधविश्वास के कारण ही हम कभी-कभी इंसानियत क्या है, यह भी भूल जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति इन के खिलाफ आवाज उठाता है, तो पूरा समाज उसकी आवाज को दबाना चाहता है। उसके खिलाफ हो जाता है। हम विदेशों से सामान खरीद रहे हैं, खेलों में पीछे हैं। सिर्फ एक-दूसरे की देखा-देखी हम बच्चों पर प्रदर्शन का मानसिक दवाब बनाते हैं। उनकी असली प्रतिभा को न पहचान कर अपनी सोच थोप देते हैं। असफलता के डर का बीज पहले ही उनके मन में रोप दिया जाता है। बहुत कम ही लोग हैं जो इन परिस्थितियों से ऊपर उठ कर कुछ अलग कर पाते हैं। सबसे पहले हमे अपने देश में उत्पादित पदार्थों का ही इस्तेमाल करने की आदत डालनी चाहिए जिससे की हम विदेशी ताकतों के गुलाम न बन पाएं। दूसरों की देखा-देखी हम विदेशी सामान अपने घर ले तो आते हैं। पर धीरे-धीरे हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं। परिणाम हम समझ ही सकते हैं।
सबसे बुद्धिमान कौन है?
एक राजा खुद से बुद्धिमान किसी को नहीं समझता था। एक दिन उसने सोचा की पता तो किया जाए की मुझ से बुद्धिमान कोई है भी या नहीं। उसने बहुत से दरबारियों, कर्मचारियों एवं मंत्री से पूछा की बताओ मेरे मन में क्या चल रहा है। सभी ने बहुत दिमाग लगाया पर कोई उसे संतुष्ट न कर सका। तब राजा ने मंत्री को आदेश दिया की वह एक महीने में दुनिया के सबसे बुद्धिमान आदमी को ढूंढ कर लाए, जो उसके विचारों का अनुमान लगा सके। इसके लिए राजा ने मंत्री को एक महीने की मोहलत दी। मंत्री बहुद दुविधा में फंस गया, उसने सब जगह तलाश की पर कोई सफलता नहीं मिली। धीरे-धीरे महीना भी खत्म होने को आ गया। मंत्री की चिंता और बढ़ गई। यह देख कर मंत्री की लड़की भी चिंतित हो उठी, तभी उसकी लड़की ने बताया की अपने यहाँ एक मुर्ख गड़रिया रहता है। आप उसको राजा के पास ले जाएं। मंत्री चिंतित होते हुए बोला, भला वो कैसे राजा के मन की बात को समझेगा। लड़की ने पिता से कहा की आप बिल्कुल निश्चिन्त रहें। मंत्री डरते हुए गडरिये को राजा के पास ले गया। राजा ने इशारे में गडरिये के सामने एक उंगली उठाई। जबाब में गडरिये ने दो ऊँगली उठाई, राजा मुस्कुराया फिर उसने तीन उंगलियां उठाई। बदले में गडरिये ने सर हिला कर न कहा। और पलट कर जाने लगा, राजा ने गडरिये को रोका और पुरुस्कार दिया। मंत्री को भी पुरुस्कार दिया तथा धन्यवाद किया। गडरिये के जाते ही मंत्री ने राजा से पूछा की आपने उससे क्या पूछा, राजा ने कहा मैंने एक उंगली उठा कर पूछा था, की क्या मुझसे बुद्धिमान भी कोई है। गडरिये ने दो उंगली उठा कर कहा "हाँ ईश्वर है।" ईश्वर मुझसे बुद्धिमान हो सकते हैं। और वो कोई इंसान भी नहीं हैं। मैंने फिर तीन उंगली उठा कर पूछा की तीसरा कौन है। गडरिये ने सर हिला कर कहा की तीसरा कोई नहीं है। मंत्री भी सोच में पड़ गया। घर जा कर उसने गडरिये से पूछा की तुम ने राजा से क्या कहा। गडरिये ने कहा मेरे पास तीन भेड़ें हैं, मुझे लगा की राजा मुझसे भेड़ लेना चाहते हैं। राजा ने एक उंगली उठा कर मुझ से पूछा की एक भेड़ चाहिए, मुझे लगा की इतना बड़ा राजा एक भेड़ मांग रहा है। मैंने कहा आप दो भेड़ ले लीजिए। फिर राजा ने तीन उंगली उठा कर कहा की तीन भेड़ दे दो। मुझे लगा की ये तो ज्यादती है भला तीनों भेड़ दे दूंगा तो मेरे पास एक भी नहीं बचेगी, तो मैंने सर हिलाकर मना कर दिया। मंत्री को जोर की हंसी आ गई, उसने गडरिये से कहा कोई बात नहीं। चिंता मत करो कोई तुम्हारी भेड़ तुम से नहीं लेगा।
Wednesday, 19 October 2016
81,000 साल में बदलता है चंद्रमा का फेस
चंद्रमा हर 81,000 साल बाद खुद का फेस बदलता रहता है। ऐसा क्षुद्रग्रह (एस्टेरॉयड) व धूमकेतु (कॉमेट) की लगातार बमबारी के कारण होता है। इसका पता नासा के लूनर प्रोब मिशन से मिले चित्रों से चला है। पूर्व के अनुमानों के मुकाबले बदलाव की यह रफ़्तार सौ गुना से भी ज्यादा है। एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी व कॉर्नेल विश्वविद्यालय के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के शोध यह से यह जानकारी सामने आई है।
क्षुद्रग्रह व धूमकेतु की बमबारी से चंद्रमा की सतह पूरी तरह बदल जाती है। इस प्रक्रिया के कारण बने क्रेटर का अध्ययन करने से यह रहस्य खुला। क्रेटर और वहां के नमूनों से क्रेटर के बनने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिली है। इसके बनने की दर और आकाशीय पिंडों के सतह से टकराने के बारे में अब भी ठोस जानकारी नहीं मिल सकी है।
पृथ्वी पर क्षुद्रग्रहों व उल्काओं के गिरने से बदलाव होते हैं लेकिन पृथ्वी की मोटी सतह इसके असर को कम कर देती है। पृथ्वी पर रोजाना हजारों टन मिट्टी अपनी दिशा बदलती है और बारिश से मिट्टी का कटाव होता है। पृथ्वी की तुलना में चंद्रमा में ऐसा सम्भव नहीं है। इसलिए रूप को बदलने में इतना समय लग जाता है।
नासा के एलआरओ प्रोब मिशन में लगे हाई रिजोल्यूशन कैमरे से ली गई तस्वीरों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है। चंद्रमा की सतह पर 222 नए क्रेटर का पता चला है। इनमें से 33 फीसदी का व्यास दस मीटर है।
Tuesday, 18 October 2016
जीवन की भागदौड़
एक शिक्षक एक बार कक्षा में छात्रों को पढ़ा रहा था। अचानक से उसने छात्रों की परीक्षा लेने की सोची, उसने छात्रों से कहा-सभी अपने-अपने नाम की पर्चियां बना लें। सभी ने तुरंत पर्चियां बना लीं। फिर शिक्षक ने उन पर्चियों को एक डिब्बे में ड़ालने को कहा सभी ने वैसा ही किया। फिर शिक्षक ने कहा की अब आप अपने-अपने नाम की पर्चियां फिर से उठा लें। सभी तुरंत अपनी-अपनी पर्चियों को उठाने के लिए दौड़ पड़े। परन्तु जल्दी खुद की पर्ची ढूढ़ने के चक्कर में किसी को भी खुद के नाम की पर्ची नहीं मिल पा रही थी। बहुत समय तक परेशान होने के बाद शिक्षक ने कहा। चलो अब एक काम करो जिसके भी नाम की पर्ची आप लोगों को मिल रही है,उस व्यक्त्ति को वापस कर दो। सभी ने ऐसा ही किया, कुछ समय में ही सभी को अपने-अपने नाम की पर्चियां मिल गईं।
फिर शिक्षक ने समझाया कि, जिस तरह हम खुद की पर्ची ढूंढ रहे थे। पर वह हम को मिल नहीं रही थी। और जैसे ही जिसके भी नाम की पर्ची हमको मिली हमने उसको वापस कर दी,जिसमे कम समय में ही सभी के नाम की पर्ची सभी को मिल गई।
ठीक इसी तरह, हम जीवन की भाग-दौड़ में खुद के लिए अकेले ही भागते रहते हैं, फिर भी खुद के लिए खुशियाँ नहीं ढूढ़ पाते। अगर हम मिलकर काम करें और मिलकर एक दूसरे का सुख-दुःख बांटे तो खुश रहना बहुत आसान हो जाएगा।
आप खुश रहना चाहते हैं तो कोशिश करें दूसरे लोग आप से खुश हों।
सब्र का फल
एक बार गौतम बुद्ध विश्व भ्रमण पर थे। उनके साथ उनके शिष्य भी थे। एक बार पैदल भ्रमण करते हुए बुद्ध एक गांव में से होकर गुजर रहे थे। कुछ देर आराम करने की सोच कर रुक गए। तभी उनको तीव्र प्यास लगी, तो उन्होंने अपने एक शिष्य को पानी लाने के लिए भेजा। शिष्य गांव में पूछते हुए पास की एक नदी तक पहुँच गया। वहां उसने देखा की नदी के किनारे कुछ लोग कपडे धो रहे हैं एवं स्नान कर रहे हैं। शिष्य ने सोचा ऐसा गन्दा पानी तो में नहीं ले जा सकता सोच कर वापिस चला गया। उसने बुद्ध को सारी बात बताई की वह पानी क्यों नहीं लाया। परन्तु बुद्ध को तीव्र प्यास लगी थी इस लिए उन्होंने दूसरे शिष्य को भेजा। दूसरा शिष्य कुछ समय पश्चात पानी ले कर आ गया। बुद्ध ने पूछा तुम कहाँ से पानी ले आये। नदी का पानी तो गन्दा था। शिष्य ने कहा मैंने कुछ समय तक लोगों के जाने का इंतजार किया। कुछ समय बाद पानी की गंदगी नीचे बैठ गई। पानी के साफ होते ही मैंने पानी भर लिया। बुद्ध ने कहा, इसी तरह हमारा जीवन होता है। सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं। जैसे पानी में उथल-पुथल होते ही वह गन्दा हो जाता है। और कुछ समय पश्चात वह पुनः साफ हो जाता है। इसी तरह दुःख कुछ समय पश्चात चला जाता है। धैर्य का धारण करने वाले व्यक्ति पानी की तरह निर्मल हो जाते हैं।
Monday, 17 October 2016
शराब ने पकड़ रखा है
एक शराब का व्यसनी व्यक्ति एक संत के पास गया और उनसे शराब छोड़ने का उपाय पूछा, उसने कहा शराब की वजह से मेरा परिवार बहुत परेशान है। बच्चे भूख से विलख रहे हैं, घर की सुख-शांति चली गई। परिवार बर्बाद हो गया है। यह सब सुन कर संत ने कहा, जब शराब से तुमको इतना नुकसान है तो इसको छोड़ क्यों नहीं देते। व्यक्ति ने कहा कि मैं तो इसको छोड़ना चाहता हूँ, पर यह मेरे खून में इस कदर समां गई है कि मुझ को छोड़ने का नाम ही नहीं लेती।
संत ने मुस्कुरा कर कहा अच्छा तो ये बात है, तुम कल आओ मैं कल कुछ प्रयास करता हूँ।
अगले दिन व्यक्ति संत के पास पहुंचा। उसने देखा की संत एक खंभे को कसकर पकड़े हुए हैं। कुछ देर तक तो वह व्यक्ति मौन खड़ा हो कर देखता रहा। परन्तु जब उससे नहीं रहा गया तो उसने संत से कहा आप इस खंभे को छोड़ क्यों नहीं देते। संत ने कहा कि मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ, पर ये खंभा मुझको छोड़ ही नहीं रहा, इसने मेरे शरीर को कस के पकड़ रखा है। व्यक्ति ने कहा भला ऐसा भी हो सकता है क्या, ये निर्जीव खंभा आपको कैसे पकड़ सकता है। व्यक्ति ने कहा मैं शराबी जरूर हूँ पर मूर्ख नहीं। यह सुन कर संत ने खंभा छोड़ कर कहा, यही मैं तुम को समझाना चाह रहा हूँ। भला निर्जीव शराब की बोतल तुम को कैसे नहीं छोड़ रही है। यह तो तुम भी जानते हो कि अगर मन में दृढ़निश्चय कर लिया जाए तो कुछ भी कार्य असंभव नहीं। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। शरीर की हर क्रिया मन के द्वारा नियंत्रित होती है, और मन में जैसी इक्छाशक्ति होती है, वैसा ही कार्य सफल होता है। अतः शराब ने तुम को नहीं पकड़ा है बल्कि शराब को तुमने पकड़ रखा है। तुम अगर आज मन में दृढनिश्चय कर लो तो आज से ही शराब छोड़ सकते हो। व्यक्ति संत की बातों से प्रभावित हो गया। और उसी दिन उसने भविष्य में शराब न पीने का निर्णय लिया। कुछ दिन पश्चात ही उसके परिवार में खुशियाँ वापस लौट आईं।
इसी तरह ऐसा कोई भी व्यसन नहीं है, जिसको एक बार करने के बाद न छोड़ा जा सके। अगर मन में दृढ़निश्चय हो तो बड़ी से बड़ी बुराई का त्याग किया जा सकता है।
नकल के लिए भी अकल चाहिए!
एक पहाड़ की ऊंची चोटी पर एक बाज रहता था। पहाड़ की तराई में बरगद के पेड़ पर एक कौआ अपना घोंसला बनाकर रहता था। वह बड़ा चालाक और धूर्त था। उसकी कोशिश सदा यही रहती थी कि बिना मेहनत किए खाने को मिल जाए। पेड़ के आसपास खोह में खरगोश रहते थे। जब भी खरगोश बाहर आते तो बाज ऊंची उड़ान भरते और एकाध खरगोश को उठाकर ले जाते।
एक दिन कौए ने सोचा, ‘वैसे तो ये चालाक खरगोश मेरे हाथ आएंगे नहीं, अगर इनका नर्म मांस खाना है तो मुझे भी बाज की तरह करना होगा। एकाएक झपट्टा मारकर पकड़ लूंगा।’
दूसरे दिन कौए ने भी एक खरगोश को दबोचने की बात सोचकर ऊंची उड़ान भरी। फिर उसने खरगोश को पकड़ने के लिए बाज की तरह जोर से झपट्टा मारा। अब भला कौआ बाज का क्या मुकाबला करता। खरगोश ने उसे देख लिया और झट वहां से भागकर चट्टान के पीछे छिप गया। कौआ अपनी हीं झोंक में उस चट्टान से जा टकराया। नतीजा, उसकी चोंच और गरदन टूट गईं और उसने वहीं तड़प कर दम तोड़ दिया।
एक दिन कौए ने सोचा, ‘वैसे तो ये चालाक खरगोश मेरे हाथ आएंगे नहीं, अगर इनका नर्म मांस खाना है तो मुझे भी बाज की तरह करना होगा। एकाएक झपट्टा मारकर पकड़ लूंगा।’
दूसरे दिन कौए ने भी एक खरगोश को दबोचने की बात सोचकर ऊंची उड़ान भरी। फिर उसने खरगोश को पकड़ने के लिए बाज की तरह जोर से झपट्टा मारा। अब भला कौआ बाज का क्या मुकाबला करता। खरगोश ने उसे देख लिया और झट वहां से भागकर चट्टान के पीछे छिप गया। कौआ अपनी हीं झोंक में उस चट्टान से जा टकराया। नतीजा, उसकी चोंच और गरदन टूट गईं और उसने वहीं तड़प कर दम तोड़ दिया।
शिक्षा—नकल करने के लिए भी अकल चाहिए।
Saturday, 15 October 2016
बंधनों से मुक्ति
आषाढ़ माह की गर्म दोपहर थी। भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ भ्रमण पर जा रहे थे। चारों तरफ रेत ही रेत बिखरी हुई थी। रेत पर चलने के कारण तथागत के पैरों के निशान बनते जा रहे थे। उसी रास्ते से एक ज्योतिषी भी अपने घर जा रहे थे। उन्होंने रेत पर बुद्ध के पैरों के निशान देखे और देखते ही रह गए। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। ज्योतिषी ने ऐसे पदचिन्ह पहले कभी नहीं देखे थे। ज्योतिषी ने सोचा शायद यह पदचिन्ह किसी चक्रवर्ती सम्राट के हो सकते हैं। लेकिन सामने जब उन्होंने बुद्ध को देखा तो उन्हें यकीन नहीं हुआ क्योंकि यह पदचिन्ह एक सन्यासी व्यक्ति के थे।
बुद्ध के चेहरे पर एक चमकती कांति थी। ज्योतिष ने हाँथ जोड़ कर निवेदन किया कि आपके पैरों में जो पद्म हैं, वह अति दुर्लभ हैं। हमारी ज्योतिष विद्या कहती है कि आपको चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए, परंतु आप तो? भगवान बुद्ध हंसे और कहा,' आपका यह ज्योतिष काम करता था। अब मैं सब बंधनों से मुक्त हो गया हूँ। जब आप सारे बंधनों से मुक्त हो जाते हैं तो न कोई ज्योतिष और न कोई विद्या काम करती है। बस रहता है तो ईश्वर का परमतत्व ज्ञान और मोक्ष प्राप्ति का रास्ता। बुद्ध का यह प्रसंग इसी बात को इंगित करता है।
जैक मा, संस्थापक - अलीबाबा डॉट कॉम
यह कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जिसने जीवन में आने वाली कठिनाइयों का डट कर सामना किया और कभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी। एक साधारण से टूरिस्ट गाइड की 800 रूपए की नौकरी से काम चालू किया और आज अरबों रुपए की संपत्ति का मालिक है। साथ ही चीन का सबसे अमीर सख्स भी है। यह सख्स है, ई-कॉमर्स कम्पनी "अलीबाबा डॉट कॉम" के संस्थापक "जैक मा" जो की अपने संघर्ष से ही सफल हुए।
"जैक मा" का जन्म 10 सितम्बर 1964 को हंग्जेहौ, चीन में हुआ था। उनके जन्म के समय चीन में साम्यवाद चरम पर था। वहां के लोगों का बाहरी दुनिया से कोई नाता नहीं था। परिवार को नेशनलिस्ट पार्टी का समर्थक होने के कारण कम्युनिस्ट पार्टी का काफी विरोध झेलना पड़ा। "जैक मा" शुरू से ही पढ़ाई में कमजोर थे। पारम्परिक शिक्षा से ज्यादा उनको जीवन के संघर्ष से सीखने को मिला। प्राथमिक शिक्षा के दौरान 2 बार तथा माध्यमिक शिक्षा के दौरान 3 बार असफल हुए।
शुरू से ही अंग्रेजी सीखना चाहते थे। इस वजह से स्कूल के दिनों से ही टूरिस्ट गाइड की नौकरी करने लगे। जिससे आमदनी के साथ-साथ अंग्रेजी भी सीख सकें।
स्कूल के बाद कॉलेज की शिक्षा के लीए आवेदन किया लेकिन प्रवेश परीक्षा में तीन बार असफल हो गए। उन्होंने हॉवर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए लगभग दस बार आवेदन किया लेकिन असफल हो गए। आखिरकार उन्हें हंग्जेहौ के "टीचर इंस्टिट्यूट" में दाखिला मिल गया जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी भाषा में सन् 1988 में स्नातक किया।
गणित में भी "जैक मा" कमजोर थे। एक बार उन्हें गणित में 100 में से 1 अंक प्राप्त हुआ था।
"जैक मा" ने कहा था कि, मैं गणित में कमजोर हूँ, मैनेजमेंट की पढ़ाई कभी की नहीं। और एकाउंट्स रिपोर्ट को पड़ना नहीं जनता।
कॉलेज के बाद उन्होंने 30 से अधिक कम्पनियों में आवेदन किया, परंतु नौकरी नहीं मिली। पुलिस की नौकरी के लिए भी आवेदन किया परन्तु वहां से भी निराशा हाँथ लगी। फिर केएफसी में भी आवेदन किया जहाँ 24 लोगों ने आवेदन किया था, जिसमे से 23 चयनित हो गए। सिर्फ एक "जैक मा" ही असफल हुए। आखिरकार एक टीचर की नौकरी मिल ही गई। कुछ समय बाद अनुवादक(ट्रांसलेटर) की नौकरी मिल गई। जिसकी वजह से अमरीका जाने का मौका मिला। जहाँ 1995 में इंटरनेट से रूबरू हुए।
इंटरनेट की जानकारी हाँसिल कर उन्होंने एक वेबसाइट 'चाइनापेज' बनाई। निवेश के लिए उन्होंने सरकारी निकाय से साझेदारी की परन्तु सरकारी नौकरशाही ने धीरे-धीरे उनकी योजना को साकार नहीं होने दिया। आखिरकार उन्होंने सरकारी निकाय की साझेदारी से अलग होना ही उचित समझा। आखिरकार निवेश की कमी और अन्य कई कारणों से उनको यह परियोजना बंद करनी पड़ी।
"चाइनापेज" की असफलता के बाद "जैक मा" ने एक नई परियोजना पर काम किया, उन्होंने एक ऐसी वेबसाइट बनाने का निर्णय किया जो की सभी तरह के व्यवसायीयों को एक पोर्टल प्रदान करे। एवं जहाँ सभी व्यवसायी अपने व्यवसाय की विस्तृत जानकारी पूरी दुनिया के साथ साझा कर सकें। इस तरह उन्होंने "अलीबाबा डॉट कॉम" नाम से वेबसाइट की शुरुआत की।
शुरू में निवेश जुटाने के लिए उन्होंने सिलिकॉन वैली का रुख किया। परन्तु वहां से निराशा ही हाँथ लगी। यहाँ तक की सिलिकॉन वैली के कुछ लोगों ने उनके इस बिज़नेस को घाटे वाला और असफल करार दिया।
हार न मानते हुए, "जैक मा" अपने प्रयास में लगे रहे और आखिर वह समय भी आ गया जब उनको दो बड़ी कम्पनियों "गोल्डमैन सैक्स" और "सॉफ्ट बैंक" ने 25 मिलियन डॉलर का निवेश किया।
इसके बाद भी "अलीबाबा डॉट कॉम" को फायदा न होता हुआ देखकर "जैक मा" ने अपनी टीम के साथ मिलकर "ताओबाओ डॉट कॉम" नाम से एक नीलामी की वेबसाइट बनाई। जिसका उदेश्य सामानों की नीलामी निशुल्क करना था। यह वेबसाइट "जैक मा" ने "ई बे"(e Bay)जैसी बड़ी ई कॉमर्स कंपनी को पछाड़ने के लिए बनाई थी।
जिसका की पहले से ही चीन के नीलामी बाजार पर प्रभुत्व था। परन्तु निशुल्क सेवा के कारण "ताओबाओ" पर आर्थिक दवाब पड़ने लगा। जिससे निपटने के लिए "जैक मा" और उनकी टीम ने वेल्यु एडेड सेवाओं की शुरुआत की जैसे की कस्टम वेबपेज। पांच वर्षों के अंदर ही "ई बे"(e Bay) को चीन के बाजार से अपने हाँथ खीचने पड़े। उसके बाद "जैक मा" की कंपनी ने कई उतार-चढ़ाव देखे। एक समय ऐसा भी आया जब कंपनी दिवालिया होने से बस 18 महीने दूर थी। पर "जैक मा" के बेमिशाल नेतृत्व, दूरदर्शिता और दृढ़संकल्प की बदौलत "अलीबाबा डॉट कॉम" न सिर्फ मुसीबत से उबर पाई बल्कि सफलता के नए शिखर पर जा पहुंची। 2013 में 10 लाख करोड़ रुपए के आईपीओ के साथ यूएस मार्केट की सबसे बड़ी आईपीओ वाली कंपनी बन गई। "जैक मा" की खुद की संपत्ति 23 बिलयन डॉलर से भी ज्यादा आंकी गई है।
यह सब "जैक मा" की काबिलियत और कभी न हार मानने की जिद की बजह से ही संभव हुआ।
Friday, 14 October 2016
बंदर और मगरमच्छ
एक तालाब के पास जामुन का एक पेड़ था। उस पेड़ पर एक बंदर रहता था। तालाब में एक मगरमच्छ रहता था। बंदर की दोस्ती धीरे-धीरे मगरमच्छ से हो गई। बंदर मगरमच्छ को मीठे और स्वादिष्ट जामुन खाने को देता था। एक बार मगरमच्छ ने कुछ जामुन बचाकर अपनी पत्नी को खाने के लिए दिए। इतने स्वादिष्ट और मीठे जामुन खाकर मगरमच्छ की पत्नी ने सोचा की अगर जामुन इतने मीठे हैं, तो बंदर तो इनको रोज खाता है। उसका दिल भी बहुत स्वादिष्ट होगा। उसने मगरमच्छ को बंदर का दिल खाने की बात बताई। मगरमच्छ ने कहा वो मेरा मित्र है, ये नहीं हो सकता। लेकिन उसकी पत्नी ने जिद नहीं छोड़ी, आखिर में मगरमच्छ को उसकी बात माननी ही पड़ी। मगरमच्छ पेड़ के पास पहुँच कर बंदर से बोला की भाभी तुम से मिलना चाहती है। बंदर चलने के लिए तैयार हो गया, और मगरमच्छ की पीठ पर सवार हो गया। रास्ते में मगरमच्छ ने सोचा की इसको सच्चाई बता देता हूँ। उसने बंदर को सब सच-सच बता दिया। बंदर ने सोचा अब तो गलती हो ही गई बचने का कुछ उपाय सोचा जाए। तभी उसको एक तरकीब आई उसने कहा, अरे यह बात तुम ने पहले क्यों नहीं बताई। दिल तो मैंने पेड़ की टहनी में खोल बना कर छिपा रखा था। चलो उसको लेकर आ जाता हूँ। फिर भाभी को देदेंगे। मगरमच्छ उसको लेकर किनारे पर आगया। बंदर ने तुरंत पेड़ पर छलांग लगा दी, और मगरमच्छ से कहा की मूर्ख कभी दिल भी शरीर से अलग होता है। बिना दिल के जीवित कैसे रह सकते हैं। जा आज से तेरी-मेरी मित्रता खत्म। मगरमच्छ उदास हो कर वापस तालाब में चला गया।
ये कहानी हम सभी ने बचपन में पढ़ी है। जब भी हम इसको पढ़ते हैं, हम को सीख मिलती है कि धूर्त व्यक्त्ति से मित्रता नहीं करना चाहिए। क्योंकि वो अवसर पा कर हम को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
रक्तदान कीजिये (Donate Blood)
*ब्लड डोनेशन में दूसरों के साथ अपना फायदा भी*
★ब्लड डोनेशन को लेकर सरकार की नीति स्पष्ट न होने के चलते बहुत से लोगों के मन में ब्लड डोनेशन को लेकर दुविधा बनी रहती है। ब्लड डोनेट करना क्यों जरूरी है और जरूरत पड़ने पर क्या करें, बता रहे हैं।
★ ब्लड डोनेट कर एक शख्स दूसरे शख्स की जान बचा सकता है।
★ ब्लड का किसी भी प्रकार से उत्पादन नहीं किया जा सकता और न ही इसका कोई विकल्प है।
★ देश में हर साल लगभग 250 सीसी की 4 करोड़ यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है। सिर्फ 5,00,000 यूनिट ब्लड ही मुहैया हो पाता है।
★ हमारे शरीर में कुल वजन का 7% हिस्सा खून होता है।
★ आंकड़ों के मुताबिक 25 प्रतिशत से अधिक लोगों को अपने जीवन में खून की जरूरत पड़ती है।
क्या हैं फायदे:-
★ ब्लड डोनेशन से हार्ट अटैक की आशंका कम हो जाती है। डॉक्टर्स का मानना है कि डोनेशन से खून पतला होता है, जो कि हृदय के लिए अच्छा होता है।
★ एक नई रिसर्च के मुताबिक नियमित ब्लड डोनेट करने से कैंसर व दूसरी बीमारियों के होने का खतरा भी कम हो जाता है, क्योंकि यह शरीर में मौजूद विषैले पदार्थों को बाहर निकालता है।
★ ब्लड डोनेट करने के बाद बोनमैरो नए रेड सेल्स बनाता है। इससे शरीर को नए ब्लड सेल्स मिलने के अलावा तंदुरुस्ती भी मिलती है।
★ ब्लड डोनेशन सुरक्षित व स्वस्थ परंपरा है। इसमें जितना खून लिया जाता है, वह 21 दिन में शरीर फिर से बना लेता है। ब्लड का वॉल्यूम तो शरीर 24 से 72 घंटे में ही पूरा बन जाता है।
ब्लड डोनेट करने से पहले:-
★ब्लड देने से पहले मिनी ब्लड टेस्ट होता है, जिसमें हीमोग्लोबिन टेस्ट, ब्लड प्रेशर व वजन लिया जाता है। ब्लड डोनेट करने के बाद इसमें हेपेटाइटिस बी व सी, एचआईवी, सिफलिस व मलेरिया आदि की जांच की जाती है। इन बीमारियों के लक्षण पाए जाने पर डोनर का ब्लड न लेकर उसे तुरंत सूचित किया जाता है।
★ ब्लड की कमी का एकमात्र कारण जागरूकता का अभाव है।
★ 18 साल से अधिक उम्र के स्त्री-पुरुष, जिनका वजन 50 किलोग्राम या अधिक हो, वर्ष में तीन-चार बार ब्लड डोनेट कर सकते हैं।
★ ब्लड डोनेट करने योग्य लोगों में से अगर मात्र 3 प्रतिशत भी खून दें तो देश में ब्लड की कमी दूर हो सकती है। ऐसा करने से असमय होने वाली मौतों को रोका जा सकता है।
★ ब्लड डोनेट करने से पहले व कुछ घंटे बाद तक धूम्रपान से परहेज करना चाहिए।
★ ब्लड डोनेट करने वाले शख्स को रक्तदान के 24 से 48 घंटे पहले ड्रिंक नहीं करनी चाहिए।
★ ब्लड डोनेट करने से पहले पूछे जाने वाले सभी प्रश्नों के सही व स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
*नोट:-
ब्लड डोनेट करने के बाद आप पहले की तरह ही कामकाज कर सकते हैं। इससे शरीर में किसी भी तरह की कमी नहीं होती।
ब्लड डोनेट करने के बाद आप पहले की तरह ही कामकाज कर सकते हैं। इससे शरीर में किसी भी तरह की कमी नहीं होती।
★इस मैसेज को हर आदमी व हर ग्रुप में पहुचाऎ ताकि रक्तदान करने वालो की गलतफहमी दूर हो सके तथा रक्तदान नहीं करने वाले भी ज्यादा से ज्यादा रक्तदान करके खुद भी स्वस्थ रहे तथा कई लोगों की जान बचा सके|
_मौका दीजिये अपने खून को, किसी की रगों में बहने का......_
_ये लाजवाब तरीका है , कई जिस्मों में ज़िंदा रहने का......._
❣❣❣
आपका ब्लड कौनसा है और उसकी उपलब्धता कितनी है?
O+ 1 in 3 37.4%
(प्रचुरता में उपलब्ध)
(प्रचुरता में उपलब्ध)
A+ 1 in 3 35.7%
B+ 1 in 12 8.5%
AB+ 1 in 29 3.4%
O- 1 in 15 6.6%
A- 1 in 16 6.3%
B- 1 in 67 1.5%
AB- 1 in 167 .6%
(दुर्लभ)
*Compatible Blood Types*
O- ले सकता है O-
O+ ले सकता है O+, O-
A- ले सकता है A-, O-
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Thursday, 13 October 2016
पांच लाख युवाओं को अप्रेन्टिस कराएंगे सार्वजनिक उपक्रम!
देश में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अप्रेन्टिस की सीटों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हो सकती है। दरअसल, केंद्र सरकार चाहती है कि सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) करीब पांच लाख युवाओं को कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत अप्रेन्टिस कराएं। जबकि वर्तमान में यह पीएसयू लगभग 36 हजार युवाओं को ही अप्रेन्टिस करवा कर प्रशिक्षित करते हैं। कौशल प्रशिक्षण विकास मंत्रालय इस क्रम में पीएसयू के लिए एक हजार करोड़ रुपए का फंड आवंटित करने की दिशा में काम कर रहा है। कौशल विकास मंत्रालय के सचिव रोहित नंदन ने बताया कि इस संबंध में मंत्रालय व दर्जनों पीएसयू के अधिकारियों के मध्य दो बार वार्ता हो चुकी है। उन्होंने कहा कि इसका लक्ष्य स्पष्ट है ज्यादा से ज्यादा युवाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार के लिए तैयार करना। रोहित नंदन ने बताया कि इसके बदले में मंत्रालय की तरफ से पीएसयू को प्रत्येक अप्रेन्टिस के प्रशिक्षण के एवज में 18 हजार रुपए दिए जाएंगे। मंत्रालय के मुताबिक यह न सिर्फ मंत्रालय बल्कि पीएसयू के लिए भी अच्छा ऑफर है। इससे पीएसयू को भी कर्मचारियों की कमी से जूझना नहीं पड़ेगा और युवा हाँथ मिल जाएंगे। वहीँ मंत्रालय का युवाओं को गुणवत्तायुक्त प्रशिक्षण देने का लक्ष्य भी पूरा हो जाएगा। मंत्रालय के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में ज्यादतर पीएसयू में 12 से 15 फीसदी तक कर्मचारियों की कमी है।
Wednesday, 12 October 2016
तीन साधु
एक बार की बात है, एक घर पर तीन साधुओं ने दस्तक दी एक महिला घर से बाहर आई। महिला ने सामने तीन साधुओं को देखा तो प्रणाम करके आने का कारण पूछा। साधुओं ने कहा की हम रास्ते से गुजर रहे थे। हमने सोचा की कुछ भोजन कर लिया जाए इस लिए आ गए। महिला ने कहा अभी मेरे पति काम पर गए हुए हैं, फिर भी मैं आप लोगों के भोजन का प्रबंध करती हूँ। तब तक आप घर में आराम कीजिए।
साधुओं ने कहा जब तक तुम्हारा पति नहीं आ जाता हम बाहर ही बैठे हैं। कुछ समय बाद पति के आते ही दोनों ने साधुओं को पुनः घर में आने को कहा, साधुओं ने कहा कि हम एक साथ अंदर नहीं आते। पति-पत्नी ने जिज्ञासा पूर्वक पूछा ऐसा क्यों, बीच में खड़े साधु ने बताया कि मेरे दायें तरफ खड़े साधु का नाम 'धन' और बाएं तरफ खड़े साधु का नाम 'सफलता' है। मेरा नाम 'प्रेम' है। अब आप लोग विचार-विमर्श करके बताएं की हम तीनों में से किसको बुलाना चाहते हैं। दोनों की चर्चा चल रही थी, पति ने कहा की धन को बुला लेते हैं। उसके बाद हम को कभी धन की कमी नहीं होगी। फिर सोच कर पति ने बोला की सफलता को बुलाना भी सही रहेगा, क्योंकि सफलता से भी धन प्राप्त किया जा सकता है। तभी पत्नी ने सोच-विचार कर कहा की प्रेम को बुलाना सही रहेगा क्यों की जहाँ प्रेम होता है वहां सफलता और धन अपने आप आ जाते हैं। इस प्रकार पत्नी की सूझबूझ से तीनो साधु उनके घर में प्रवेश कर गए और भोजन पश्चात आशीर्वाद दिया।
Tuesday, 11 October 2016
10 साल में 26.8 करोड़ बच्चे हो जाएंगे 'मोटे'
बच्चों में मोटापा एक बड़ी समस्या बनकर सामने आ गया है। वैश्विक अनुमानों की मानें तो एक दशक में 5 से 17 वर्ष के 26.8 करोड़ बच्चे ओवरवेट होंगे। सरकारें इस और ध्यान नहीं दे रही हैं, इससे मोटापा बढ़ रहा हैं।
एक सर्वे के अनुसार 2025 तक 1.20 करोड़ बच्चे शरीर में ग्लूकोज की जरुरी क्षमता की कमी से पीड़ित होंगे जबकि 40 लाख टाइप टू डायबिटीज के शिकार होंगे। 2.7 करोड़ बच्चे जहाँ हाइपरटेंशन तो 3.8 करोड़ बच्चे लीवर में फैट से पीड़ित होंगे।
समाज के लिए खतरे की घंटी:
समाज को जागरूक हो कर इस ओर कुछ ठोस कदम उठाना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा खेल-कूद और अन्य गतिविधियों पर ध्यान देना चाहिए। फास्ट फ़ूड एवं ज्यादा चिकनाईयुक्त भोजन नहीं खिलाना चाहिए।
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