एक सेठ चतुराई से व्यापार चलाता था। उसके घर में तीन प्राणी थे। पति, पत्नी और एक छोटा बच्चा। दिन बड़े सुख से गुजर रहे थे। एक दिन घर में अचानक आग गई। जब आग पलंग के निकट आ गई, सेठ-सेठानी जागे और चिल्लाए। दोनों मिलकर बहुमूल्य वस्तुएं बचाने में जुट गए। पड़ोसी भी शोर सुनकर जाग गए और सामान निकालने में मदद करने लगे। आग काबू में आ गई। सेठ-सेठानी ने बचे हुए सामान पर नजर डाली तो संतोष की सांस ली। बहुमूल्य सामान आग की चपेट से बचा लिया गया था। जब सब कुछ शांत हो गया तो देखा कि अपना प्राण प्यारा बच्चा तो है ही नहीं। जले हुए घर में जा कर देखा तो पाया कि सोने वाले कमरे में ही बच्चा पलँग पर पड़ा रहा और जल कर मर गया। हाहाकार मच गया। माता-पिता विलाप कर रहे थे। संबंधी, कुटुम्बियों ने उसकी अंत्योष्टि की। माता-पिता विक्षिप्त बने बैठे थे। मिलने आने वालों में से एक ने कहा, 'अग्निकांड देखकर आप लोग सम्पत्ति बचाने तो दौड़, पर बच्चे को बचाने की याद क्यों नहीं रही?' दुर्घटना की चर्चा जहाँ-तहाँ बहुत दिनों तक होती रही। एक गोष्ठी में उस घटना का उदाहरण देकर एक ज्ञानी बता रहे थे, ' मनुष्य धन-दौलत को ही सब कुछ समझता है, और उसी को बढ़ाने-बचाने के लिए हाँथ-पैर मारता रहता है। अंत में इतना घाटा आता है, जिसकी क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती।' उस सेठ की तरह हम सब भी तो सदा जीवन संपदा की ऐसी ही उपेक्षा करते हैं।
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सांपों के देश में एक ऐसा नेवला
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