Wednesday, 2 November 2016

पाप और पानी



एक दिन एक संत अपने प्रवचन में कह रहे थे, 'अतीत में तुमसे जो पाप हो गए हैं उनका प्राश्चित करो और भविष्य में पाप न करने का संकल्प लो।' प्रवचन समाप्त होने के बाद जब सभी लोग चले गए, एक व्यक्ति थोड़ा सकुचाते हुए संत के पास पहुंचा। उसने संत से पूछा, 'महाराज, मन में एक जिज्ञासा है। प्राश्चित करने से पापों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है?' संत ने उसे दूसरे दिन आने को कहा। दूसरे दिन वह उसे एक नदी के किनारे ले गए। नदी तट पर एक गड्ढे में भरा पानी सड़ रहा था। इसके कारण उससे बदबू आ रही थी और उसमें कीड़े भी चल रहे थे। संत उस व्यक्ति को सड़ा पानी दिखाकर बोले, 'भैया, यह पानी देख रहे हो? बताओ यह क्यों सड़ा?' व्यक्ति ने पानी को ध्यान से देखा और कहा, 'स्वामी जी, प्रवाह रुकने के कारण पानी एक जगह ठहर गया है और इस कारण सड़ रहा है।' इस पर संत ने कहा, 'ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप भी इकट्ठे हो जाते हैं, और वे कष्ट पहुंचाते रहते हैं। जिस तरह वर्षा का पानी इस सड़े पानी को बहा कर हटा देता है, और नदी को पवित्र बना देता है, उसी प्रकार प्राश्चित रूपी अमृत वर्षा इन पापों को नष्ट कर मन को पवित्र बना देती है। इसलिए प्राश्चित से व्यक्ति का अतीत और  भविष्य दोनों ही पवित्र होत हैं।'

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