एक व्यापारी के मरने पर उसके दो पुत्रों को उसकी संपत्ति मिली । एक पुत्र ने अपने व्यापार को काफी बढ़ाया। जबकि दूसरे को व्यापार में घाटा हो गया और उसे दो जून की रोटी जुटाने में भी अत्यंत तकलीफें उठानी पड़ीं। अपने भाई की तरक्की और अपनी दुर्दशा देखकर दूसरा भाई एक संत के आश्रम में पहुंचा और बोला, 'महाराज, मुझे लगता है कि ईश्वर केवल कल्पना है और यदि उसका अस्तित्व कहीं है भी तो वह पक्षपाती है। मैं और मेरे भाई दोनों को पिता की संपत्ति का बराबर हिस्सा मिला। लेकिन वह लगातार तरक्की कर रहा है, और मैं रसातल की और जा रहा हूं। भला ऐसा क्यों ?' संत उसे अपने साथ एक बगीचे में ले गए और बोले, 'देखो, वहां एक कोने में गन्ना बोया हुआ है। दूसरे कोने में चिरायता है । एक और चमेली के फूल अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं, तो दूसरी और गुलाब के पौधों पर फूलों के साथ कांटे भी नजर आ रहे हैं। इसकी इस भिन्नता के लिए इन्हें पैदा करने वाली जमीन दोषी या पक्षपाती नहीं है। जैसा बीज बोया गया है, वैसा ही फल मिला है। सुख-दुख और उन्नति-अवनति के लिए ईश्वर जिम्मेदार नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य जिम्मेदार है। तुम्हारे भाई ने मेहनत और योग्यता से अपने काम को संभाला तो उसकी उन्नति हो गई। इसके विपरीत तुमने आलस्य और भोग-विलास में अपना समय व्यतीत किया तो तुम्हारा धन धीरे-धीरे खत्म होता गया। तुमने मेहनत की ही कब थी जो ईश्वर को दोष दे रहे हो। जैसा कर्म तुमने किया है, वैसा ही फल पाया है।'
Tuesday, 15 November 2016
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सांपों के देश में एक ऐसा नेवला
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