Wednesday, 23 November 2016

बुरे वक्त में भगवान

एक भक्त था। वह भगवान को बहुत मानता था, बड़े प्रेम और भाव से उनकी सेवा किया करता था। एक दिन भगवान से कहने लगा, ' मैं आपकी इतनी भक्ति करता हूं पर आज तक मुझे आपकी अनुभूति नहीं हुई। मैं चाहता हूं कि आप भले ही मुझे दर्शन न दें पर ऐसा कुछ कीजिए कि मुझे ये अनुभव हो की आप हो।' भगवान ने कहा, ठीक है। तुम रोज सुबह समुद्र के किनारे सैर पर जाते हो। जब तुम रेत पर चलोगे तो तुम्हे दो पैरों की जगह चार पैर दिखाई देंगे। दो तुम्हारे पैर होंगे और दो पैरों के निशान मेरे होंगे। इस तरह तुम्हे मेरी अनुभूति होगी।' अगले दिन वह सैर पर गया। जब वह रेत पर चलने लगा तो उसे अपने पैरों के साथ-साथ दो पैर और भी दिखाई दिए। वह बड़ा खुश हुआ। अब रोज ऐसा होने लगा। एक बार उसे व्यापार में घाटा हुआ। उसके अपनों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। अब वह सैर पर गया तो उसे चार पैरों के जगह दो पैर दिखाई दिए। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बुरे वक्त में भगवान ने साथ छोड़ दिया। धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा। फिर सब लोग उसके पास वापस आने लगे। एक दिन जब वह सैर पर गया तो उसने देखा कि चार पैर वापस दिखाई देने लगे हैं। उससे अब रहा नहीं गया। वह बोला, 'भगवान् जब मेरा बुरा वक्त था तो सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर मुझे इस बात का गम नहीं था क्योंकि इस दुनिया में ऐसा ही होता है पर आपने भी उस समय मेरा साथ छोड़ दिया था। ऐसा क्यों किया?'

भगवान् ने कहा, 'तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूंगा। बुरे वक्त में रेत पर तुमने दो पैर के निशान देखे, वे मेरे पैरों के थे। उस समय में तुम्हें गोद में उठाकर चलता था और आज जब तुम्हारा बुरा वक्त ख़त्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है।'

Tuesday, 22 November 2016

दूसरों के लिए


एक राजा ने किसी वृद्ध को एक छोटा सा पौधा लगाते देखा। राजा ने उससे पूछा तो वृद्ध ने कहा, 'यह अखरोट का पौधा है।' राजा ने हिसाब लगाया कि उसके बड़े होने और उस पर फल आने में कितना समय लगेगा। फिर बोला, 'सुनो बाबा, इस पौधे के बड़े होने और उस पर फल आने में कई साल लग जाएंगे। तब तक तुम तो रहोगे नहीं।' वृद्ध राजा के मन के विचार को ताड़ गया। उसने राजा से कहा, 'हां, यह बात सही है कि फल आने तक मैं रहूं या न रहूं। लेकिन यह भी सोचिए कि इस बूढ़े ने दूसरों की मेहनत का कितना फायदा उठाया है? दूसरों के लगाए पेड़ों के कितने फल अपनी जिंदगी में खाए हैं। मैं क्या, आप भी आज जो फल खा रहे हैं, उसके पौधे बहुत पहले कभी किसी ने लगाए ही होंगे। क्या मुझे इस भावना से पेड़ नहीं लगाने चाहिए कि उनके फल दूसरे लोग खा सकें?' वृद्ध के विचार जान राजा उसके सामने नतमस्तक हो गया।

Monday, 21 November 2016

जीवनदान


एक राजा की चार रानियां थीं। एक दिन प्रसन्न हो कर राजा ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। रानियों ने कहा समय आने पर वो मांग लेंगी। कुछ समय बाद राजा ने एक अपराधी को मृत्युदंड दिया। बड़ी रानी ने सोचा की इस मरणासन्न व्यक्ति को एक दिन का जीवन दान देकर उसे उत्तम पकवान खिला कर खुश करना चाहिए। उन्होंने राजा से प्रार्थना की, 'मेरे वरदान के रूप में आप इस अपराधी को एक दिन का जीवन दान दें और उसका आतिथ्य मुझे करने दें।' रानी की प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। रानी ने अपराधी को स्वादिष्ट भोजन कराया। किन्तु अपराधी ने उस राजसी खाने में कोई खाश रूचि नहीं ली। दूसरी रानी ने भी वही वरदान मांगा और अपराधी को राजसी वस्त्र दिए। पर अपराधी असंतुष्ट रहा। तीसरे दिन तीसरी रानी ने फिर वही वरदान मांगकर उसके नृत्य संगीत की व्यवस्था की। परन्तु अपराधी का मन तनिक भी नहीं लगा। चौथे दिन सबसे छोटी रानी ने राजा से प्रार्थना की , 'मैं वरदान में चाहती हूं कि इस अपराधी को क्षमादान दिया जाए।' रानी की प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। उस रानी ने अपराधी को सुखी रोटियां खिलाईं। उसने बड़े आनंद से  खाया। राजा ने अपराधी से इस बारे में पूछा तो वह बोला, 'राजन, मुझे तो छोटी रानी की रूखी-सुखी रोटियां सबसे स्वादिष्ट लगीं। क्योंकि तब मुझे मृत्यु का भय नहीं था। उससे पहले मौत के भय के कारण मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।'

Sunday, 20 November 2016

कीड़े का संघर्ष


महर्षि वेदव्यास किसी नगर से गुजर रहे थे। उन्होंने एक कीड़े को तेजी से भागते हुए देखा। मन में सवाल उठा, 'एक छोटा-सा कीड़ा इतनी तेजी से क्यों भागा जा रहा है?' उन्होंने कीड़े से पूछा, 'ऐ क्षुद्र जंतु! तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो?' कीड़ा बोला, 'हे महर्षि, आप तो इतने ज्ञानी हैं। यहां क्षुद्र कौन और महान कौन? क्या इनकी सही-सही परिभाषा संभव है?' महर्षि सकपकाए। फिर सवाल किया, 'अच्छा बताओ कि तुम इतनी तेजी से कहां भागे जा रहे हो?' इस पर कीड़े ने कहा, 'अरे! मैं तो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा हूं। देख नहीं रहे की कितनी तेजी से बैलगाड़ी दौड़ी चली आ रही है।' कीड़े के उत्तर ने महर्षि को फिर चौंकाया। वह बोले, 'पर तुम तो इस योनि में पड़े हो। यदि मर गए तो तुम्हें दूसरा और अच्छा शरीर मिलेगा।' इस पर कीड़ा बोला, 'महर्षि! मैं तो कीड़े की योनि में रहकर कीड़े का आचरण कर रहा हूं। पर ऐसे प्राणी बहुत हैं, जिन्हें विधाता ने शरीर तो मनुष्य का दिया है। पर वे मुझ कीड़े से भी गया-गुजरा आचरण कर रहे हैं।' महर्षि उस नन्हे से जीव के कथन पर सोचते रहे। फिर उन्होंने उससे कहा, 'चलो, हम तुम्हरी सहायता कर देते हैं।' कीड़े ने पूछा, 'किस तरह की सहायता?' महर्षि बोले, 'तुम्हें उठाकर मैं आने वाली बैलगाड़ी से दूर पहुंचा देता हूं।' इस पर कीड़े ने कहा, 'धन्यवाद! श्रम रहित पराश्रित जीवन विकास के सारे द्वार बंद कर देता है। मुझे स्वयं ही संघर्ष करने दीजिए।' महर्षि को कोई जवाब न सुझा।

Wednesday, 16 November 2016

दौलत की चाह


एक विद्धान संत घूमते हुए एक नगर के बाहर रुके। संत की नेकी और भलाई की सब तरफ चर्चा थी। नगर के जाने-माने एक सेठ उनके दर्शन के लिए आ पहुंचे। वह अपने साथ ढेर सारी स्वर्ण मुद्राएं लेकर आए थे। उन्होंने थैली संत के चरणों में रख दी और हांथजोड़ कर खड़े हो गए। संत ने थैली पर नजर डाली, फिर मुस्कुराते हुए पूछा, 'क्या इसके अलावा भी आपके पास और दौलत है?' सेठ जी ने प्रसन्न होकर सोचा कि संत को और भी धन चाहिए। सेठ ने कहा, 'मेरे पास तो इससे कई गुना धन-संपत्ति और है। संत ने पूछा, 'क्या आप और दौलत पाने की ख्वाहिश रखते हैं?' सेठ ने कहा, 'हां, हां क्यों नहीं, अब इतने से क्या होता है। थोड़ी और दौलत मिल जाए तो जिंदगी बेहतर हो जायेगी।' संत ने कहा, 'तब तो ये दौलत भी आप ही रख लीजिए। इसकी असल जरुरत तो आपको ही है। आपको और धन-संपत्ति चाहिए। इतना आप मुझे ही दे देंगे तो आपका खजाना थोड़ा खाली हो जाएगा। जिसके पास सब कुछ हो लेकिन और पाने की चाह हो, उसके दान का भी कोई अर्थ नहीं हैं।' यह सुनकर सेठ जी लज्जित हो गए।

Tuesday, 15 November 2016

बीज और फल


एक व्यापारी के मरने पर उसके दो पुत्रों को उसकी संपत्ति मिली । एक पुत्र ने अपने व्यापार को काफी बढ़ाया। जबकि दूसरे को व्यापार में घाटा हो गया और उसे दो जून की रोटी जुटाने में भी अत्यंत तकलीफें उठानी पड़ीं। अपने भाई की तरक्की और अपनी दुर्दशा देखकर दूसरा भाई एक संत के आश्रम में पहुंचा और बोला, 'महाराज, मुझे लगता है कि ईश्वर केवल कल्पना है और यदि उसका अस्तित्व कहीं है भी तो वह पक्षपाती है। मैं और मेरे भाई दोनों को पिता की संपत्ति का बराबर हिस्सा मिला। लेकिन वह लगातार तरक्की कर रहा है, और मैं रसातल की और जा रहा हूं। भला ऐसा क्यों ?' संत उसे अपने साथ एक बगीचे में ले गए और बोले, 'देखो, वहां एक कोने में गन्ना बोया हुआ है। दूसरे कोने में चिरायता है । एक और चमेली के फूल अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं, तो दूसरी और गुलाब के पौधों पर फूलों के साथ कांटे भी नजर आ रहे हैं। इसकी इस भिन्नता के लिए इन्हें पैदा करने वाली जमीन दोषी या पक्षपाती नहीं है। जैसा बीज बोया गया है, वैसा ही फल मिला है। सुख-दुख और उन्नति-अवनति के लिए ईश्वर जिम्मेदार नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य जिम्मेदार है। तुम्हारे भाई ने मेहनत और योग्यता से अपने काम को संभाला तो उसकी उन्नति हो गई। इसके विपरीत तुमने आलस्य और भोग-विलास में अपना समय व्यतीत किया तो तुम्हारा धन धीरे-धीरे खत्म होता गया। तुमने मेहनत की ही कब थी जो ईश्वर को दोष दे रहे हो। जैसा कर्म तुमने किया है, वैसा ही फल पाया है।'

Monday, 14 November 2016

कमंडल में हलवा


एक धनी सेठ ने एक संत के पास आकर उनसे प्रार्थना की, 'महाराज, मैं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना करता हूं। पर मेरा मन एकाग्र ही नहीं हो पाता । आप मुझे मन को एकाग्र करने का कोई मंत्र बताइए ।' सेठ की बात सुनकर संत बोले, ' मैं कल तुम्हारे घर आऊंगा और तुम्हें एकाग्रता का मंत्र प्रदान करूंगा ।' सेठ ने इसे अपना सौभाग्य समझा कि इतने बड़े संत उसके घर पधारेंगे । उसने अपनी हवेली की सफाई करवाई और संत के लिए स्वादिष्ट पकवान तैयार करवाए । नियत समय पर संत उसकी हवेली पर पधारे । सेठ ने उनका खूब स्वागत-सत्कार किया । सेठ की पत्नी ने मेवों व शुद्ध घी से स्वादिष्ट हलवा तैयार किया था । चांदी के बर्तन में में हलवा सजाकर संत को दिया गया तो संत ने फौरन अपना कमंडल आगे कर दिया और बोले, ' यह हलवा इस कमंडल में डाल दो ।' सेठ ने देखा कि कमंडल में पहले ही कूड़ा-करकट भरा हुआ है । वह दुविधा में पड़ गया । उसने संकोच के साथ कहा, 'महाराज, इस कूड़े में हलवा कैसे डाल सकता हूं । हलवा तो इस कूड़े-करकट के साथ मिलकर दूषित हो जाएगा ।' यह सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, 'वत्स, तुम ठीक कहते हो । जिस तरह कमंडल में कूड़ा भरा है । उसी तरह तुम्हारे दिमाग में भी बहुत सी ऐसी चीजें भरी हैं, जो आत्मज्ञान के मार्ग में बाधक हैं । सबसे पहले पात्रता विकसित करो तभी तो आत्मज्ञान के योग्य बन पाओगे । यदि मन-मस्तिष्क में विकार-कुसंस्कार भरे रहेंगे तो एकाग्रता कहां से आएगी ।

Thursday, 10 November 2016

1000/500 के नोट से जुड़े सवालों के जवाब...


प्रश्न(1) बुजुर्ग हूँ, 3 लाख रुपए जमा हैं। घर पर ही पैसे रखता था। अब क्या होगा?

जवाब:- खाता खुलवाएं, सामान्य रूप से जो भी पैसे जमा होते हैं। उसे चालू साल की कमाई माना जाता है। आपका पैसा अगर पिछले सालों का है तो सबूत और सोर्स बताना होगा। नहीं तो यह काला धन माना जाएगा ।

प्रश्न(२) मुझे एक एजेंट ने कमीशन लेकर नोट बदलवाने का ऑफर दिया, क्या करूँ?

जवाब:- झांसे में न आएं। बैंकों को नए नोटों की लगातार सप्लाई दी जा रही है। एक दिन इंतजार कर लें, कोई कमीशन नहीं देना पड़ेगा ।

प्रश्न(3) पैसा जमा कराने गया, उसमें नकली नोट निकल गए तो?

जवाब:- नकली नोट बैंक रख लेगा । वह पैसा खाते में जमा नहीं होगा । छोटी रकम है तो संभवतः पुलिस कार्यवाही भी न हो ।

प्रश्न(4) 4 - 5 लाख रुपए घर में रखता हूं । क्या बैंक में जमा करने पर टैक्स देना होगा?

जवाब:- कैश रखने की सीमा टर्नओवर के हिसाब से तय होती है । अगर आपके खातों में दर्ज है कि इतना पैसा नियमित रूप से आता है तो चिंता मत करिए । कैश आया है तो अकाउंट में लिखा भी होगा कि वह किस मद में आया है । अगर वह इससे अलग है तो कालाधन माना जाएगा ।

प्रश्न(5) क्या काला धन रखने वालों के खिलाफ आगे और भी कार्यवाही संभव है?

जवाब:- बिल्कुल । कंपनियों के कलेक्शन के हिसाब से कैश रखने की सीमा होती है । इसे घटाया जा सकता है । ज्यादा कैश मिला तो कार्यवाही होगी । पहले सरकार ने 50 लाख रूपए से ज्यादा कमाई वालों से सोने की जानकारी मांगी थी । करीब 80% लोगों का डेटा सरकार के पास है । आगे ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं ।

प्रश्न(6) बेटी के गुल्लक में पैसे, वह पूछ रही है कि क्या यह भी कालाधन हो गया?

जवाब:- नहीं, लेकिन अगर उनमें 500/1000 के नोट हैं तो बदलवाने पड़ेंगे । सरकार कह चुकी है कि 2.5 लाख रुपए तक जमा कराने वाले निश्चिंत रहें । इस पर कोई पूछताछ नहीं होगी ।

प्रश्न(7) मकान बेचने पर कलेक्टर गाइडलाइन के मुताबिक कुछ रकम चेक से और बाकी कैश ली । उस कैश का क्या होगा?

जवाब:- प्रोपर्टी के पेपर में जो रकम लिखी हुई है, अगर पैसे उससे ज्यादा हैं तो वह कालाधन माना जाएगा । उस रकम पर टैक्स भी देना होगा और नियम के मुताबिक जुर्माना भी लगेगा ।

प्रश्न(8) मेरे यहां दो दिन पहले शादी थी । गिफ्ट में 5 लाख के 500/1000 रुपए के नोट जमा हो गए हैं । अब मैं क्या करूं?

जवाब:- आप सभी नोट बैंक से बदलवा सकते हैं । पर आयकर विभाग के सामने शादी के सबूत देने होंगे । मसलन शादी का इन्विटेशन कार्ड, होटल या मैरिज हॉल का बिल, केटरर का बिल आदि । ताकि दावा साबित कर सकें । 1 लाख रूपए से ज्यादा के गिफ्ट पर पूछताछ हो सकती है । बताना पड़ेगा की किसने कितने पैसे दिए ।

प्रश्न(9) बेटी की शादी के लिए जमीन बेची थी । कैश में 10 लाख हैं । कुछ पैसे उधार भी लिए थे । अब क्या करें?

जवाब:- पुराने नोट तो नहीं चलेंगे । आपको ये पैसे बैंक में जमा कराने ही होंगे । जमीन बेंची है तो उसके कागजात होंगे । उस पर रकम भी लिखी होगी । आयकर विभाग को इसकी कॉपी दिखानी होगी । उधार लिया है तो उसका भी सोर्स बताना होगा ।

प्रश्न(10) मेरे पास एक करोड़ रुपए कैश हैं । मैं इसे बैंक में जमा कराने जा रहा हूं । क्या मुझे 200% पैनाल्टी देनी होगी?

जवाब:- आप जितना चाहे बैंक में जमा करा सकते हैं । पर अगर आप 2.5 लाख रुपए से ज्यादा करेंगे तो आयकर विभाग को बताया जाएगा । विभाग आपके टैक्स रिटर्न से मिलान करेगा । पैसे आय से अधिक हुए तो उस पर टैक्स और जुर्माना लगेगा । जुर्माना टैक्स का 200% होगा ।

प्रश्न(11) अब मान लें आप की 1 एक करोड़ रूपए अघोषित आय है । तो...

जवाब:- इस एक करोड़ का 30% यानी 30 लाख टैक्स काटेगा । अब इसे 200% यानी 60 लाख रुपए जुर्माना लगेगा । इसका मतलब हुआ आप सिर्फ 10 लाख रुपए ही घर लेकर जा सकते हैं । और अगर यह अघोषित आय है तो आप पहले ही टैक्स दे चुके हैं । फिर कोई कटौती नहीं होगी ।

प्रश्न(12) अगर ये एक करोड़ रुपए अघोषित हैं और मैं इसे जमा नहीं करता हूं तो?

जवाब:- 500/1000 के नोट हैं तो नहीं चलेंगे । आयकर छापे में पकडे गए तो और सख्त कार्यवाही होगी ।

प्रश्न(13) मैं एक करोड़ को अलग-अलग लोगों के खाते में 2-2 लाख जमा करा दूं तो?

जवाब:- संभव तो है । पर आयकर विभाग को भी पता है कि ऐसा हो सकता है । इसलिए 30 दिसंबर तक ऐसे ट्रांजेक्शन पर नजर रहेगी । पिछला रिटर्न देखा जा सकता है । सोर्स पूछा जा सकता है ।

Wednesday, 9 November 2016

इस शनिवार-रविवार को भी खुलेंगे सभी बैंक


*इस शनिवार-रविवार को भी खुलेंगे सभी बैंक*
कालेधन पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने 500 और 1000 हजार रुपए के नोट बंद कर दिए हैं। इससे जनता को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसी परेशानी को देखते हुए आरबीआई ने ग्राहकों को सुविधा ने देने के उद्देश्य से शनिवार और रविवार को बैंक खुले रखने का फैसला लिया है। इसके अलावा बैंक का समय भी बढ़ाते हुए चार के बजाय छह बजे तक कर दिया गया है। इस फैसले के साथ ही बैंक ग्राहकों को राहत मिलती नजर आ रही है। अब वह अपना पुराना नोट आराम से जाकर बैंक में बदल सकेंगे।

राष्ट्रहित में लिया गया ऐतिहासिक फैसला no


PM मोदी का ऐलान: 500 और 1000 के नोट अब नहीं चलेंगे,
राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि 8 नवंबर-9 नवंबर की मध्यरात्रि से 500 और 1000 के नोट बंद हो जाएंगे। पीएम ने कहा, '500 और 1000 रुपये के पुराने नोट 10 नवंबर से 30 दिसंबर 2016 तक आप अपने बैंक या डाकघर के खाते में जमा करवा सकते हैं।'
जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आपकी धनराशि आपकी ही रहेगी, आपको कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। किसी कारणवश अगर आप 30 दिसंबर तक ये नोट जमा नहीं कर पाए, तो आपको एक आखिरी अवसर भी दिया जाएगा। आपके पास 50 दिनों का समय है।
500 और 1000 के नोटों के अलावा बाकी सभी नोट और सिक्के नियमित हैं और उनसे लेन-देन हो सकता है।
मुख्य बातें:
-अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों पर विदेश से आ रहे या जा रहे लोगों के पास यदि पुराने नोट हैं तो ऐसे नोटों की 5000 रुपये तक की राशि को नये और मान्य नोटों से बदलने की सुविधा दी जाएगी: पीएम मोदी
-सार्वजनिक क्षेत्र के पेट्रोल और सीएनजी गैस स्टेशन पर भी 11 नवंबर की रात 12 बजे तक पुराने नोट स्वीकार करने की छूट होगी: पीएम मोदी
-इसी तरह 72 घंटों तक रेलवे के टिकट बुकिंग काउंटर, सरकारी बसों के टिकट बुकिंग काउंटर और हवाई अड्डों पर भी केवल टिकट खरीदने के लिए पुराने नोट मान्य होंगे: पीएम मोदी
-11 नवंबर की रात्रि 12 बजे तक सभी सरकारी अस्पतालों में पुराने 500 के नोट भुगतान के लिए स्वीकार किए जाएंगे: पीएम मोदी
-11 नवंबर की रात्रि 12 बजे तक नागरिकों के लिए कुछ विशेष व्यवस्था की है: पीएम मोदी
-9 और 10 नवंबर को ATM काम नहीं करेंगे: पीएम मोदी

Saturday, 5 November 2016

सूर्य और दीपक

चीन के सम्राट हुआन शी को पढ़ने का शौक था। उनका पुस्तकालय और सोने का कमरा दुनियाभर की किताबों से भरा रहता था। वह अपना अधिकतर समय पढ़ने में ही लगाते थे। एक दिन सम्राट ने अपने मंत्री शान ची से कहा, 'मैं अब सत्तर वर्ष का हो चला हूं। मगर पढ़ने की लालसा मन से जाती नहीं है। पर लगता है कि अब इस उम्र में पुस्तकों को अधिक समय नहीं दे पाऊंगा।' मंत्री ने जवाब दिया, 'राजन, आप इस देश के सूर्य हैं। आपके ज्ञान के प्रकाश से ही देश का शासन सफलतापूर्वक चलता रहा है। अगर आप सूर्य नहीं बने रहना चाहते तो कृपया दीपक बन जाइए।' सम्राट को लगा मंत्री ने सूर्य से दीपक बनने को कहकर उन्हें उनके स्तर से गिराया है। उन्होंने नाराजगी भरे स्वर में कहा, 'शान ची, मैं गंभीर होकर यह बात कह रहा हूं और तुम इसे मजाक में ले रहे हो। मैं तो तुम से मार्गदर्शन की अपेक्षा कर रहा था।' शान ची ने हांथ जोड़कर कहा, 'आपने मेरी बात ठीक से समझी नहीं शायद। कोई किशोर या युवा जब अध्ययन कर रहा होता है तो उसका भविष्य सूर्य के समान होता है, जिसमे  अपार सम्भावनाएं छिपी होती हैं। प्रौढ़ावस्था में यही सूर्य दीपक के समान हो जाता है। दीपक में सूर्य जितना प्रकाश तो नहीं होता, फिर भी उसका उजाला अंधेरे में रोशनी दिखाकर भटकने से बचाता है। इसी प्रकार आप भी पढ़ने की अपनी रूचि का पूर्ण त्याग न करके इसमें मन लागए रखें।' सम्राट को बात समझ में आ गईं।

Friday, 4 November 2016

मौत से भय

महाराज शतद्रुम बड़े पराक्रमी और नीतिकुशल सम्राट थे। उनके विशाल साम्राज्य और ऐश्वर्य की चर्चा चारों और थी। लेकिन सभी  की देह कभी न कभी काल का कौर बनती है। शतद्रुम की बारी भी आ गई। राजवैध के प्रयास भी उन्हें बचा न सके। परंतु मरते-मरते भी जीवन-लालसा छुटी नहीं। उन्होंने मंत्रियों एवं महारानी से कहा, 'उनका शरीर जलाया न जाए, बल्कि उसे सुरक्षित रखने का यत्न किया जाए। किसी ऐसे तेजस्वी मुनि की खोज की जाए जो मृत शरीर में पुनः प्राणों का संचार कर दे।' मंत्री एवं महारानी को संयोग से ऐसे ऋषि मिल भी गए। सारी बातें सुनकर महर्षि ने कहा, 'पहले हमें यह पता करना पड़ेगा कि मृत्यु के बाद महाराज की जीवात्मा कहाँ,किस योनि में है?' महर्षि ने पता लगाया कि शतद्रुम राजोद्यान में एक कीड़े की योनि में हैं। सेनापति उस कीड़े को मारने पहुंचे तो वह भय से इधर-उधर छिप रहा था। यह देख कर महर्षि हंसे और बोले, 'यही मृत्यु-भय है, जो एक कीड़े में उतना ही है, जितना कि शतद्रुम में था। महाराज जितना पूर्व शरीर में सुखी थे, उतने ही अभी भी हैं। जब वे स्वयं इस कीड़े के शरीर को नहीं छोड़ना चाहते तो उन्हें व्यर्थ परेशान न करो।' सभी ने महर्षि की बात मान ली।

Thursday, 3 November 2016

उदार जिगर



प्रख्यात शायर जिगर मुरादाबादी बहुत ही उदार और दयालु थे। किसी की मदद करने का कोई मौका वह नहीं छोड़ते थे। अपने इस स्वाभाव के चलते वह काफी लोकप्रिय थे और लोग उन्हें सम्मान देते थे। एक बार वह अपने मित्र के साथ कहीं जा रहे थे। जिगर साहब के दोस्त ने देखा कि एक शख्स उन्हें देख कर ऑंखें चुरा रहा है और मुंह छिपाने की कोशिश कर रहा है। दोस्त ने कहा, 'हजरत! माजरा क्या? वह आदमी आपको देख कर इस तरह झेंप क्यों रहा था? और ऑंखें क्यों चुरा रहा था?' जिगर मुरादाबादी बोले, 'अच्छी तरह जानता हूँ उसे। हकीकत यह है कि एक दिन इस आदमी ने मेरी जेब से पैसे चुराए थे। इसलिए मुझे पहचान कर झेंप रहा था।' इस पर मित्र ने कहा,' जब तुम्हें पता चल गया कि यह वही है तो तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? मैं उसकी खबर लेता।' जिगर ने हंस कर कहा 'अरे भाई, उसकी खबर लेने के लिए मैं गया था उसके घर। पर वहां जो देखा, उसे बयान करना मुश्किल है। क्या बताऊँ, उसके घर की हालत बहुत खराब थी। उसके बीवी-बच्चों के पास खाने को कुछ नहीं था। अब तुम ही बताओ, मैं क्या करता। मैं चुपचाप वहां से लौट आया।' दोस्त यह सुनकर अवाक रह गया। उसके भीतर मुरादाबादी के लिए थोड़ी और इज्जत बढ़ गई।

Wednesday, 2 November 2016

पाप और पानी



एक दिन एक संत अपने प्रवचन में कह रहे थे, 'अतीत में तुमसे जो पाप हो गए हैं उनका प्राश्चित करो और भविष्य में पाप न करने का संकल्प लो।' प्रवचन समाप्त होने के बाद जब सभी लोग चले गए, एक व्यक्ति थोड़ा सकुचाते हुए संत के पास पहुंचा। उसने संत से पूछा, 'महाराज, मन में एक जिज्ञासा है। प्राश्चित करने से पापों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है?' संत ने उसे दूसरे दिन आने को कहा। दूसरे दिन वह उसे एक नदी के किनारे ले गए। नदी तट पर एक गड्ढे में भरा पानी सड़ रहा था। इसके कारण उससे बदबू आ रही थी और उसमें कीड़े भी चल रहे थे। संत उस व्यक्ति को सड़ा पानी दिखाकर बोले, 'भैया, यह पानी देख रहे हो? बताओ यह क्यों सड़ा?' व्यक्ति ने पानी को ध्यान से देखा और कहा, 'स्वामी जी, प्रवाह रुकने के कारण पानी एक जगह ठहर गया है और इस कारण सड़ रहा है।' इस पर संत ने कहा, 'ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप भी इकट्ठे हो जाते हैं, और वे कष्ट पहुंचाते रहते हैं। जिस तरह वर्षा का पानी इस सड़े पानी को बहा कर हटा देता है, और नदी को पवित्र बना देता है, उसी प्रकार प्राश्चित रूपी अमृत वर्षा इन पापों को नष्ट कर मन को पवित्र बना देती है। इसलिए प्राश्चित से व्यक्ति का अतीत और  भविष्य दोनों ही पवित्र होत हैं।'

पैसा हाय पैसा


एक सेठ चतुराई से व्यापार चलाता था। उसके घर में तीन प्राणी थे। पति, पत्नी और एक छोटा बच्चा। दिन बड़े सुख से गुजर रहे थे। एक दिन घर में अचानक आग गई। जब आग पलंग के निकट आ गई, सेठ-सेठानी जागे और चिल्लाए। दोनों मिलकर बहुमूल्य वस्तुएं बचाने में जुट गए। पड़ोसी भी शोर सुनकर जाग गए और सामान निकालने में मदद करने लगे। आग काबू में आ गई। सेठ-सेठानी ने बचे हुए सामान पर नजर डाली तो संतोष की सांस ली। बहुमूल्य सामान आग की चपेट से बचा लिया गया था। जब सब कुछ शांत हो गया तो देखा कि अपना प्राण प्यारा बच्चा तो है  ही नहीं। जले हुए घर में जा कर देखा तो पाया कि सोने वाले कमरे में ही बच्चा पलँग पर पड़ा रहा और जल कर मर गया। हाहाकार मच गया। माता-पिता विलाप कर रहे थे। संबंधी, कुटुम्बियों ने उसकी अंत्योष्टि की। माता-पिता विक्षिप्त बने बैठे थे। मिलने आने वालों में से एक ने कहा, 'अग्निकांड देखकर आप लोग सम्पत्ति बचाने तो दौड़, पर बच्चे को बचाने की याद क्यों नहीं रही?' दुर्घटना की चर्चा जहाँ-तहाँ बहुत दिनों तक होती रही। एक गोष्ठी में उस घटना का उदाहरण देकर एक ज्ञानी बता रहे थे, ' मनुष्य धन-दौलत को ही सब कुछ समझता है, और उसी को बढ़ाने-बचाने के लिए हाँथ-पैर मारता रहता है। अंत में इतना घाटा आता है, जिसकी क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती।' उस सेठ की तरह हम सब भी तो सदा जीवन संपदा की ऐसी ही उपेक्षा करते हैं।

सूर्य पर ध्यान दो!


एक राजा की कथा है, जिसने अपने तीन दरबारियों को एक ही अपराध की तीन प्रकार से सजा दी। पहले को कुछ समय के लिए कारावास दिया, दूसरे को देश निकाला और तीसरे से कहा मुझे आश्चर्य है, मुझे तुमसे इस कार्य की अपेक्षा नहीं थी।
तीनों को अलग -अलग सजा मिली और तीनों दुखी थे। पर तीनों के दुःख का कारण भी अलग-अलग था। पहला और दूसरा व्यक्ति दूसरों के समक्ष अपमानित महसूस कर रहे थे और तीसरा स्वयं के समक्ष। पहला व्यक्ति कारागृह में ही आनंद से रहने लगा और जेल में ही उसने मित्र बना लिए। दूसरा व्यक्ति दूसरे देश में व्यापार करने लगा और वही बहुत बड़ा व्यापारी बन गया। तीसरा व्यक्ति क्या करता? उसका पश्चाताप गहरा था क्यों की  स्वयं के समक्ष था। उससे शुभ की अपेक्षा की गई थी। यह बात उसे कांटे की तरह चुभ रही थी और यही उसको ऊपर की और उठा रही थी। जिस बात की उससे अपेक्षा की गई थी वह उसकी चाह से भर गया। शुभ या अशुभ, शुभ के जन्म का प्रारंभ है। सत्य पर विश्वास उसके अंकुरण के लिए वर्षा है और सौन्दर्य पर निष्ठा। सोये सौन्दर्य को जगाने के लिए सूर्योदय है। अशुभ एक दुर्घटना है और उसे देख कर मनुष्य स्वयं के समक्ष अपमानित भी महसूस करता है। सूर्य बदलियों के पीछे छुपजाने से स्वयं बदली नहीं हो जाता। बदलियों पर विश्वास न करें। किसी भी स्थिति में न करें। सूर्य पर विश्वास हो तो उसके उदय में शीघ्रता होती है।

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला पैदा हो गया, जो सांप तो क्या, किसी भी जानवर से लड़ना नहीं चाहता था। सभी नेवलों में यह बात फैल गई। आखिरकार एक ...