मनुष्य कई बार ऐसी परिस्थितियों में फँस जाता है, जब वह अपने आप को बहुत असहाय पाता है। परेशानियों से मुक्ति का कोई उपाय नहीं सूझता और मदद करने वाले लोग भी अपने हाँथ खींच लेते हैं। ऐसे में अक्सर मनुष्य या तो लोगों के प्रति दुर्भावनाएं पाल लेता है या हताशा का शिकार हो जाता है। मनुष्य अनेक उतार-चढ़ाव से होकर गुज़रता है। जिन्हें हम अवतारी चरित्रों के रूप में पूजते हैं। मानव योनि में परेशानियों का सामना। उन्हें भी करना पड़ा है। उनसे जुडी कहानियां बताती हैं कि विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस और अदभुत धैर्य का परिचय देकर ही वे अपने व्यक्तित्व को महान बना सके हैं।
सार्वभौमिक सत्य है कि विफलताओं के बावजूद कोशिशों का क्रम केवल धैर्य और विश्वास और आस्था के साथ हार को जीत में बदलने वाले योद्धाओं से इतिहास भरा हुआ है।
तुलसीदास जी ने एक स्थान पर लिखा भी है, धीरज, धर्म, मित्र, अरु नारी / आपद काल परखिये चारि। जब जीवन में कठिन हालात हों तभी व्यक्ति को स्वयं के धैर्य, कर्तव्य साधना, साथियों और जीवनसाथी की निष्ठा का सही अनुमान हो पाता है।
पुरातन काल से आधुनिक काल तक अनेक उदाहरण हैं-
धैर्य ने पोरस को किया अमर
सिकंदर से हारकर जब युद्धबंदी के रूप में पोरस को सिकंदर के सामने प्रस्तुत किया गया। सिकंदर ने दंभ से पूछा, 'तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाये?' पोरस ने भी उतने ही स्वाभिमान से उत्तर दिया, 'वैसा ही, जैसा एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिए।' सिकंदर यह उत्तर सुन कर अचंभित रह गया। हारा हुआ राजा विश्वविजेता के सम्मुख बराबरी का दावा कैसे कर सकता है? लेकिन पोरस ने किया क्योंकि कठिन परिस्थियों में भी उसने अपने धैर्य का दामन नहीं छोड़ा था और इस लिए युद्ध हारने के बावजूद इतिहास में पोरस का नाम अमर हो गया।

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