एक महात्मा किसी राजा के महल में उसका आतिथ्य स्वीकार करने गया। राजा ने उन्हें सत्कार देते हुए कुछ दिन वहीं रुकने को कहा। समय मिलने पर वे दोनों प्रतिदिन धर्म-चर्चा करने लगे। एक दिन राजा ने महात्मा से कहा, 'सूरज के निकलने पर दिए बुझा दिए जाते हैं। बारिश होने के बाद खेत में पानी नहीं दिया जाता। आप मेरे राज्य में आ गए हैं तो मुझे शासन करने की आवश्यकता नहीं हैं। मेरे शासन में हर तरफ अव्यवस्था है, पर आप शासन करेंगे तो सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा।' महात्मा ने उत्तर दिया, ' तुम्हारा शासन सर्वोत्तम नहीं है, पर बुरा भी नहीं है। मेरे शासक बन जाने पर लोगों को यह लगेगा कि मैंने शक्ति और संपत्ति के लालच में राज करना स्वीकार कर लिया है। उनके इस प्रकार सोचने पर और अधिक अव्यवस्था फैलेगी। मेरा राजा बनना वैसा ही होगा, जैसे कोई अतिथि के भेष में घर का मालिक बन बैठे।' राजा को यह सुनकर निराशा हुई। महात्मा ने कहा, 'चिड़िया घने जंगल में अपना घोंसला बनाती है, पर पेड़ की एक डाल ही चुनती है। पशु नदी से उतना ही जल पीते हैं, जितने से उनकी प्यास बुझ जाती है। भले हो कोई रसोइया अपने भोजनालय को साफ़-सुथरा नहीं रखता हो, पर कोई पुजारी उसका स्थान नहीं ले सकता।
Saturday, 24 December 2016
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सांपों के देश में एक ऐसा नेवला
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