Thursday, 15 October 2020

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला


सांपों के देश में एक ऐसा नेवला पैदा हो गया, जो सांप तो क्या, किसी भी जानवर से लड़ना नहीं चाहता था। सभी नेवलों में यह बात फैल गई। आखिरकार एक सभा बुलाई गई और वहां तय हुआ कि अगर नेवला किसी और जानवर से लड़ना नहीं चाहे, तो कोई बात नहीं, मगर सांपों से लड़ना और उनका खात्मा करना हर नेवले का फर्ज है। वह शांतिप्रिय नेवला भी उस पंचायत में मौजूद था। उसने तत्काल सवाल किया, फर्ज क्यों?

उसका यह पूछना था कि नेवले तरह-तरह के कयास लगाने लगे। उन्होंने समझा और आपस में कहा-सुना भी कि यह न केवल सांपों का हिमायती और नेवलों का दुश्मन दिख रहा है, बल्कि नए ढंग से सोचने वाला और नेवला-जाति की परंपराओं एवं आदर्शों का विरोधी भी है।

उस नेवले के पिता ही कहने लगे, वह पागल है। उसकी मां ने भी कहा, वह बीमार है। भाई भी कहां पीछे रहने वाला था, वह तपाक से बोला, वह बुजदिल है। इसके बाद तो जिन नेवलों ने उसे कभी देखा नहीं था, उन्होंने भी कहना शुरू कर दिया कि वह नेवला सांपों की तरह रेंगता है, और नेवला-जाति को नष्ट कर देना चाहता है। शांतिप्रिय नेवले ने प्रतिवाद किया, मैं तो शांतिपूर्वक सोचने-समझने की कोशिश कर रहा हूं।

यह सुनकर तत्काल एक अन्य नेवला बोल उठा, सोचना गद्दारी की निशानी है! दूसरा चिल्लाया, सोचना तो हमारे दुश्मनों का काम है। फिर तो यह भी अफवाह फैल गई कि सांपों की तरह उस नेवले के भी जहर के दांत हैं। तब उस पर मुकदमा चला और बहुमत से उसे देश-निकाले की सजा दे दी गई। यानी जो दुश्मन के हाथों न मारा जाए, वह अपने ही लोगों के हाथों मारा जा सकता है।

Monday, 23 March 2020

अगले दो सप्ताह बचाव के लिए क्यों महत्वपूर्ण


स्वास्थय मंत्रालय ने देश में स्टेज-3 के कोरोना वायरस (कोविड-19) के फैलने की आशंका जाहिर की है। इसमें कहा गया है कि अगले दो सप्ताह बचाव के लिए बहुत मत्वपूर्ण हैं। इसमें मरीज से दूसरे लोग में फैलने की आशंका है। क्योंकि पहले स्टेज से मरीज दूसरे दूसरे देश से आए। स्टेज-2 में कोरोना पॉजिटिव से उनके घर वालों में फैला जबकि स्टेज -3 में आसपास के लोगों में फैलने का डर है। इसलिए बचाव पर जोर दिया जा रहा है। भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में न जाने की सलाह दी जा रही है।

क्या कहते हैं आंकड़े?
चीन,इटली,फ्रांस,ईरान और स्पेन में स्टेज-3 में ही सबसे अधिक केस रिपोर्ट किए जा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि अगर इस बीमारी को स्टेज-2 में ही रोका नहीं गया तो यह भयानक तरीके से फैलती है। इसे कंट्रोल करना थोड़ा मुश्किल होता है। स्टेज-3 में ही बीमारी हर देश में कई गुना अधिक फैली है।

हैल्दी टिप्स - हर व्यक्ति रोज करीब 1,000 बार नाक, मुंह, आंख, कान, आदि को छूता है। इसलिए हांथ धोना जरूरी है।

Sunday, 22 March 2020

कोरोना वायरस के बारे में जानकारी / COVID19


CORONA-कब तक

कोरोना नाम की उत्पत्ति कोरोनम (लैटिन) से हुई है इसका इंग्लिश अर्थ है क्राउन। कोरोना वायरस के बाहरी खोल पर ग्लाइकोप्रोटीन के काँटों जैसी संरचना के कारण यह बाहर से ताज (crown) जैसा दिखता है। इस कारण इसे यह नाम दिया गया। नोवेल-कोविड-19, नोवेल कोरोना वायरस डिसीज़ 2019 का एक्रोनिम है। इसे नोवेल (new)  कोरोना वायरस कहा जा रहा है क्योंकि यह कोरोना वायरस नया है।

कोरोना वायरस वर्ग में लक्षणों के आधार पर सामान्यतः 4 प्रकार के वायरस अल्फा, बीटा, डेल्टा, गामा पाए जाते हैं और इनमें से अधिकांश जानवरों को ही संक्रमित करते हैं। कुछ ही ऐसे वायरस हैं जो मानवों को संक्रमित कर सके हैं  नोवेल कोरोना वायरस से पूर्व दो अन्य कोरोना वायरसों का वैश्विक प्रकोप  मानवों पर देखने को मिला है। पहला  SARS- CoV (सार्स कोरोना वायरस)  सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (2002-03, चीन) के लिए और दूसरा  MERS-CoV (मर्स कोरोना वायरस) मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (2012, सऊदी अरब) के लिए उत्तरदायी था। नोवेल कोरोना वायरस की समानता SARS-CoV  से होने के कारण इसे SARS-CoV2 (severe acute respiratory syndrome corona virus 2) नाम भी दिया गया है।

SARS-CoV2 पॉजिटिव सिंगल स्ट्रेन्डेड RNA वायरस हैं जो इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप में देखने पर अपने बाहरी खोल पर कांटेदार आवरण के कारण क्राउन जैसे दिखते हैं। WHO  के अनुसार इनका प्रथम मानव संक्रमण कैसे हुआ ये अभी भी शोध का विषय है, पर एक संक्रमित मानव से स्वस्थ मानव तक ये खाँसने, छींकने पर निकलने वाली संक्रमित छोटी बूंदों से फैलता है। ये संक्रमित बूंदे सीधे श्वास के माध्यम से, या संक्रमित सतह को छूने और उसके बाद संक्रमित हाथों से आंख-नाक-मुँह छूने से फैलता है। इसका इन्क्यूबेशन पीरियड 2 दिनसे 2 सप्ताह तक है मतलब शरीर में ये बिना खुद को व्यक्त किये (बिना कोई बीमारी के लक्षण दिखाये) 2 दिन से 2 सप्ताह तक रह सकता है।

इन्क्यूबेशन पीरियड के दौरान सावधानी न बरतने पर इस वायरस का वाहक व्यक्ति संपर्क में आने वाले लोगों और सतहों को संक्रमित कर सकता है। इन लोगों और सतहों के संपर्क में आने पर एवं पर्याप्त सावधानी न बरतने पर यह वायरस तेज़ी से अन्य लोगों में भी फैल सकता है इसलिए किसी भी बहुत ज्यादा भीड़ वाली जगहों पर जाने से, सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल से, अनावश्यक रूप से घर से बाहर निकलने से लोगों को मना किया जा रहा है और एक दूसरे से दूरी बरतने सलाह दी जा रही है। खासकर प्रभावित क्षेत्रों से आये लोगों को खुद को अपने घर में ही क्वारंटाइन (संगरोध; संक्रमण से बचाव हेतु दूसरों से भौतिक संपर्क में न रहने) की सलाह दी जा रही है।

क्योंकि इस वायरस का बाहरी खोल गलाईकोप्रोटीन से बना है इसलिए साबुन से धोने पर या अल्कोहल युक्त सैनीटाइज़र से धोने पर इस वायरस का बाहरी खोल ध्वस्त हो जाता है और सिर्फ जेनेटिक मैटेरियल (+ss RNA) वातावरण में एक्सपोज़ हो जाता है और वायरस खत्म हो जाता है। इसी कारण सभी को साबुन से अच्छी तरह से हाथ धोने और पानी उपलब्ध न होने पर ऐल्कहाल युक्त सैनीटाइज़र हाथ पर अच्छी तरह से  लगाने की सलाह दी जा रही है। वैश्विक समुदाय इसका उपचार ढूंढने में लगा हुआ है पर जब तक उपचार नहीं मिल जाता इसके संक्रमण से बचाव का सबसे प्रभावकारी रास्ता  यही है। इसके अलावा कुछ सामान्य आचारगत बदलाव लाकर हम कोरोना के फैलाव को रोक सकते हैं --

•खुद को स्व-संगरोध (self quarantine) करना अर्थात दूसरों से भौतिक संपर्क से बचना।

•अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले स्थानों, शादी, धार्मिक आयोजनों, रैली, सभा, जुलूसों पर न जाना।

•संदिग्ध या संक्रमित व्यक्ति से दूरी बरतना।

•संदिग्ध लक्षण दिखने पर संदिग्ध को स्व-संगरोध (self quarantine) के लिए तथा चिकित्सकीय सहायता के लिए प्रेरित करना और इसकी सूचना स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य केंद्र को देना।

• स्वयं, अपने परिवार और अपने समुदाय को व्यक्तिगत स्वच्छता पर ध्यान देने प्रेरित करना। बाहर से या किसी भी संदिग्ध या संक्रमित स्थान से आने पर साबुन से या अल्कोहलयुक्त सैनी टाइज़र से हाथ धोना, अपने मोबाइल फ़ोन को बाहर से आने पर ऐल्कहॉल युक्त सैनिटाइज़र से साफ़ करना, घर के फ़र्श और सतहों की साबुन या डिसइंफैक्टेंट से सफ़ाई करना।

•सर्दी-ज़ुकाम या बुखार के लक्षण दिखने या शंका होने पर, खाँसते और छींकते समय मुँह पर रुमाल रखना/मास्क पहनना या कोहनियों से मुँह ढँकना।

• सब्ज़ियाँ और खाद्य पदार्थों को अच्छे से पकाकर खाना।

बस इन कुछ बुनियादी उपायों पर अमल करके ही हम खुद अपने प्रति, अपने परिवार के प्रति और राष्ट्र के प्रति एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभाएंगे।

आगे कोरोना वायरस  के संबंध में बरती जाने वाली मुख्य सावधानियों और अधिकांश पूछे जाने वाले कुछ बिंदुओं पर चर्चा की गई है, जो WHO ने अपने आधिकारिक साइट पर ज़ारी किया हैं।

• मास्क: WHO के अनुसार मास्क तब ही ज़रूरी है जब आप किसी कोविड के संदिग्ध मरीज की पास से देखभाल कर रहे हैं या खाँस या छींक रहे हैं। मास्क का इस्तेमाल, हाथों की सफाई के साथ और ठीक तरह से किये जाने पर ही असरदार है।

-मास्क पहनने से पहले हाथ साबुन या अल्कोहलयुक्त सैनिटाइजर से साफ करें।
- अपने मुंह और नाक को मास्क से ऐसे ढंके कि, आपकी चेहरे की त्वचा और मास्क के बीच कोई खाली जगह न रहे।

-उपयोग के दौरान मास्क को हाथों से न छुयें, छू लेने पर अपने हाथों को पुनः साबुन या अल्कोहोलयुक्त सैनिटाइजर से साफ करें।

-जैसे ही मास्क खराब हो जाये इसे पीछे कान की ओर से पकड़कर खोलें, सामने से मास्क को न छुयें और एक बंद डस्टबिन में डाल दें। इसके बाद हाथ को साबुन या अल्कोहलयुक्त सैनीटाइज़र से साफ करें। सिंगल यूज मास्क को दुबारा इस्तेमाल न करें।

• कोरोना वायरस ठंडे के साथ ही गर्म और आर्द्र क्षेत्रों में भी फैल सकता है। इसलिये आप किन्ही भी क्षेत्रों में रहते हों इससे बचाव हेतु आपको सावधानी बरतने की ज़रूरत है।

• कोरोना का संक्रमण मच्छरों के काटने से नहीं फैलने के संबंध में अभी तक कोई प्रमाण प्राप्त नहीं हुए हैं।

•निमोनिया का टीका कोरोना से बचाव नहीं करता, कोरोना नया पैथोजन है और इसका इलाज अभी भी खोजा जा रहा है।

•कोरोना वायरस के प्रति सभी उम्र के लोगों को सावधानी बरतने की ज़रूरत है। ऐसा नहीं है कि, यह युवा लोगों को संक्रमित नहीं कर सकता।

•वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक्स प्रभावी नहीं होती हैं इसलिये कोरोना संक्रमण में भी यह प्रभावी नहीं होंगी।  कोरोनावायरस एक नया वायरस है जिसका इलाज अभी तक खोजा नहीं गया है।

Information about COVID19 (Corona Virus) / कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

राजस्थान के भीलवाड़ा में
केरल के कुछ क्षेत्रों में कोरोना तीसरे स्टेज में पहुंच चुका है।


अच्छी बात यह है कि मध्यप्रदेश में यह स्टेज 1से 2 तक है।


ये स्टेज क्या होती हैं?

पहली स्टेज

विदेश से नवांकुर आया। एयरपोर्ट पर उसको बुखार नहीं था। उसको घर जाने दिया गया। पर उससे एयरपोर्ट पर एक शपथ पत्र भरवाया गया कि वह 14 दिन तक अपने घर में कैद रहेगा। और बुखार आदि आने पर इस नम्बर पर सम्पर्क करेगा।
घर जाकर उसने शपथ पत्र की शर्तों का पालन किया।
वह घर में कैद रहा।
यहां तक कि उसने घर के सदस्यों से भी दूरी बनाए रखी।

नवांकुर की मम्मी ने कहा कि अरे तुझे कुछ नहीं हुआ। अलग थलग मत रह। इतने दिन बाद घर का खाना मिलेगा तुझे, आजा किचिन में... मैं गरम गरम् परोस दूं।

नवांकुर ने मना कर दिया।

अगली सुबह मम्मी ने फिर वही बात कही। इस बार नवांकुर को गुस्सा आ गया। उसने मम्मी को चिल्ला दिया। मम्मी की आंख में आंसू झलक आये। मम्मी बुरा मान गयीं।

नवांकुर ने सबसे अलग थलग रहना चालू रखा।

6-7वें दिन नवांकुर को बुखार सर्दी खांसी जैसे लक्षण आने लगे। नवांकुर ने हेल्पलाइन पर फोन लगाया। कोरोना टेस्ट किया गया। वह पॉजिटिव निकला।
उसके घर वालों का भी टेस्ट किया गया। वह सभी नेगेटिव निकले।
पड़ोस की 1 किमी की परिधि में सबसे पूछताछ की गई। ऐसे सब लोगों का टेस्ट भी किया गया। सबने कहा कि नवांकुर को किसी ने घर से बाहर निकलते नही देखा।
चूंकि उसने अपने आप को अच्छे से आइसोलेट किया था इसीलिए उसने किसी और को कोरोना नहीं फैलाया।
नवांकुर जवान था। कोरोना के लक्षण बहुत मामूली थे। बस बुखार सर्दी खांसी बदन दर्द आदि हुआ। 7 दिन के ट्रीटमेंट के बाद वह बिल्कुल ठीक होकर अस्पताल से छुट्टी पाकर घर आ गया।

जो मम्मी कल बुरा मान गईं थीं, वो आज शुक्र मना रहीं हैं कि घर भर को कोरोना नहीं हुआ।


यह पहली स्टेज जहां सिर्फ विदेश से आये आदमी में कोरोना है। उसने किसी दूसरे को यह नहीं दिया।
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स्टेज 2-  राजू में कोरोना पॉजिटिव निकला।
उससे उसकी पिछले दिनों की सारी जानकारी पूछी गई। उस जानकारी से पता चला कि वह विदेश नहीं गया था। पर वह एक ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आया है जो हाल ही में विदेश होकर आया है। वह परसों गहने खरीदने के लिए एक ज्वेलर्स पर गया था। वहां के सेठजी हाल ही में विदेश घूमकर लौटे थे।


सेठजी विदेश से घूमकर आये थे।उनको एयरपोर्ट पर बुखार नहीं था। इसी कारण उनको घर जाने दिया गया। पर उनसे शपथ पत्र भरवा लिया गया, कि वह अगले 14 दिन एकदम अकेले रहेंगे और घर से बाहर नहीं निकलेंगे। घर वालों से भी दूर रहेंगे।
विदेश से आये इस गंवार सेठ  ने एयरपोर्ट पर भरे गए उस शपथ पत्र की धज्जियां उड़ाईं।
घर में वह सबसे मिला।
शाम को अपनी पसंदीदा सब्जी खाई।
और अगले दिन अपनी ज्वेलेरी दुकान पर जा बैठा। (पागल हो क्या! सीजन का टेम है, लाखों की बिक्री है, ज्वेलर साब अपनी दुकान बंद थोड़े न करेंगे)

6वें दिन ज्वेलर को बुखार आया। उसके घर वालों को भी बुखार आया। घर वालों में बूढ़ी मां भी थी।
सबकी जांच हुई। जांच में सब पॉजिटिव निकले।

यानि विदेश से आया आदमी खुद पॉजिटिव।
फिर उसने घर वालों को भी पॉजिटिव कर दिया।

इसके अलावा वह दुकान में 450 लोगों के सम्पर्क में आया। जैसे नौकर चाकर, ग्राहक आदि।
उनमें से एक ग्राहक राजू था।


सब 450 लोगों का चेकअप हो रहा है। अगर उनमें किसी में पॉजिटिव आया तो भी यह सेकंड स्टेज है।

डर यह है कि इन 450 में से हर आदमी न जाने कहाँ कहाँ गया होगा।


कुल मिलाकर स्टेज 2 यानी कि जिस आदमी में कोरोना पोजिटिव आया है, वह विदेश नहीं गया था। पर वह एक ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आया है जो हाल ही में विदेश होकर आया है।
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स्टेज 3

रामसिंग को सर्दी खांसी बुखार की वजह से अस्पताल में भर्ती किया, वहां उसका कोरोना पॉजिटिव आया।
पर रामसिंग न तो कभी विदेश गया था।
न ही वह किसी ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आया है जो हाल ही में विदेश होकर आया है।

यानि हमें अब वह स्रोत नहीं पता कि रामसिंग को कोरोना आखिर लगा कहाँ से??

स्टेज 1 में आदमी खुद विदेश से आया था।

स्टेज 2 में पता था कि स्रोत सेठजी हैं। हमने सेठजी और उनके सम्पर्क में आये हर आदमी का टेस्ट किया और उनको 14 दिन के लिए अलग थलग कर दिया।


स्टेज 3 में आपको स्रोत ही नहीं पता।

 स्रोत नहीं पता तो हम स्रोत को पकड़ नहीं सकते। उसको अलग थलग नहीं कर सकते।
वह स्रोत न जाने कहाँ होगा और अनजाने में ही कितने सारे लोगों को इन्फेक्ट कर देगा।

*स्टेज 3 बनेगी कैसे?*

सेठजी जिन 450 लोगों के सम्पर्क में आये। जैसे ही सेठजी के पॉजिटिव होने की खबर फैली, तो उनके सभी ग्राहक,नौकर नौकरानी, घर के पड़ोसी, दुकान के पड़ोसी, दूध वाला, बर्तन वाली, चाय वाला....सब अस्पताल को दौड़े।
सब लोग कुल मिलाकर 440 थे।
10 लोग अभी भी नहीं मिले।
पुलिस व स्वास्थ्य विभाग की टीम उनको ढूंढ रही है।
उन 10 में से अगर कोई किसी मंदिर आदि में घुस गया तब तो यह वायरस खूब फैलेगा।
यही स्टेज 3 है जहां आपको स्रोत नहीं पता।


*स्टेज 3 का उपाय*
14 दिन का lockdown
कर्फ्यू लगा दो।
शहर को 14 दिन एकदम तालाबंदी कर दो।
किसी को बाहर न निकलने दो।

इस तालाबंदी से क्या होगा??

हर आदमी घर में बंद है।
जो आदमी किसी संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में नहीं आया है तो वह सुरक्षित है।
जो अज्ञात स्रोत है, वह भी अपने घर में बंद है। जब वह बीमार पड़ेगा, तो वह अस्पताल में पहुंचेगा। और हमें पता चल जाएगा कि अज्ञात स्रोत यही है।

हो सकता है कि इस अज्ञात श्रोत ने अपने घर के 4 लोग और संक्रमित कर दिए हैं, पर बाकी का पूरा शहर बच गया।

अगर LOCKDOWN न होता। तो वह स्रोत पकड़ में नहीं आता। और वह ऐसे हजारों लोगों में कोरोना फैला देता। फिर यह हजार अज्ञात लोग लाखों में इसको फैला देते। इसीलिए lockdown से पूरा शहर बच गया और अज्ञात स्रोत पकड़ में आ गया।

*क्या करें कि स्टेज 2, स्टेज 3 में न बदले।*
Early lockdown यानी स्टेज 3 आने से पहले ही तालाबन्दी कर दो।
यह lockdown 14 दिन से कम का होगा।

उदाहरण के लिए
सेठजी एयरपोर्ट से निकले
उनने धज्जियां उड़ाईं।
घर भर को कोरोना दे दिया।
सुबह उठकर दुकान खोलने गए।
(गजब आदमी हो यार! सीजन का टेम है, लाखों की बिक्री है, अपनी दुकान बंद कैसें कर लें)

पर चूंकि तालाबंदी है।
तो पुलिस वाले सेठजी की तरफ डंडा लेकर दौड़े।
डंडा देख सेठजी शटर लटकाकर भागे।

अब चूंकि मार्किट बन्द है।
तो 450 ग्राहक भी नहीं आये।
सभी बच गए।
राजू भी बच गया।
बस सेठजी के परिवार को कोरोना हुआ।
6वें 7वें दिन तक कोरोना के लक्षण आ जाते हैं। विदेश से लौटे लोगों में लक्षण आ जाये तो उनको अस्पताल पहुंचा दिया जायेगा। और नहीं आये तो इसका मतलब वो कोरोना नेगेटिव हैं।

Tuesday, 22 October 2019

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Sunday, 21 April 2019

पछतावा




*पछतावा*
आस्ट्रेलिया की ब्रोनी वेयर कई वर्षों तक कोई meaningful काम तलाशती रहीं, लेकिन कोई शैक्षणिक योग्यता एवं अनुभव न होने के कारण बात नहीं बनी।
फिर उन्होंने एक हॉस्पिटल की Palliative Care Unit में काम करना शुरू किया। यह वो Unit होती है जिसमें Terminally ill या last stage वाले मरीजों को admit किया जाता है। यहाँ मृत्यु से जूझ रहे लाईलाज बीमारियों व असहनीय दर्द से पीड़ित मरीजों के मेडिकल डोज़ को धीरे-धीरे कम किया जाता है और काऊँसिलिंग के माध्यम से उनकी spiritual and faith healing की जाती है ताकि वे एक शांतिपूर्ण मृत्यु की ओर उन्मुख हो सकें।
ब्रोनी वेयर ने ब्रिटेन और मिडिल ईस्ट में कई वर्षों तक मरीजों की counselling करते हुए पाया कि मरते हुए लोगों को कोई न कोई पछतावा ज़रूर था।
कई सालों तक सैकड़ों मरीजों की काउंसलिंग करने के बाद ब्रोनी वेयर  ने मरते हुए मरीजों के सबसे बड़े 'पछतावे' या 'regret' में एक कॉमन पैटर्न पाया।
जैसा कि हम सब इस universal truth से वाकिफ़ हैं कि मरता हुआ व्यक्ति हमेशा सच बोलता है, उसकी कही एक-एक बात epiphany अर्थात 'ईश्वर की वाणी' जैसी होती है। मरते हुए मरीजों के इपिफ़नीज़ को  ब्रोनी वेयर ने 2009 में एक ब्लॉग के रूप में रिकॉर्ड किया। बाद में उन्होनें अपने निष्कर्षों को एक किताब “THE TOP FIVE REGRETS of the DYING" के रूम में publish किया। छपते ही यह विश्व की Best Selling Book साबित हुई और अब तक  लगभग 29 भाषाओं में छप चुकी है। पूरी दुनिया में इसे 10 लाख से भी ज़्यादा लोगों ने पढ़ा और प्रेरित हुए।
ब्रोनी द्वारा listed 'पाँच सबसे बड़े पछतावे' संक्षिप्त में ये हैं:
1) "काश मैं दूसरों के अनुसार न जीकर अपने अनुसार ज़िंदगी जीने की हिम्मत जुटा पाता!"
यह सबसे ज़्यादा कॉमन रिग्रेट था, इसमें यह भी शामिल था कि जब तक हम यह महसूस कर पाते हैं कि अच्छा स्वास्थ्य ही आज़ादी से जीने की राह देता है तब तक यह हाथ से निकल चुका होता है।
2) "काश मैंने इतनी कड़ी मेहनत न की होती"
ब्रोनी ने बताया कि उन्होंने जितने भी पुरुष मरीजों का उपचार किया लगभग सभी को यह पछतावा था कि उन्होंने अपने रिश्तों को समय न दे पाने की ग़लती मानी।
ज़्यादातर मरीजों को पछतावा था कि उन्होंने अपना अधिकतर जीवन अपने कार्य स्थल पर खर्च कर दिया!
उनमें से हर एक ने कहा कि वे थोड़ी कम कड़ी मेहनत करके अपने और अपनों के लिए समय निकाल सकते थे।
3) "काश मैं अपनी फ़ीलिंग्स का इज़हार करने की हिम्मत जुटा पाता"
ब्रोनी वेयर ने पाया कि बहुत सारे लोगों ने अपनी भावनाओं का केवल इसलिए गला घोंट दिया ताकि शाँति बनी रहे, परिणाम स्वरूप उनको औसत दर्ज़े का जीवन जीना पड़ा और वे जीवन में अपनी वास्तविक योग्यता के अनुसार जगह नहीं पा सके! इस बात की कड़वाहट और असंतोष के कारण उनको कई बीमारियाँ हो गयीं!
4) "काश मैं अपने दोस्तों के सम्पर्क में रहा होता"
ब्रोनी ने देखा कि अक्सर लोगों को मृत्यु के नज़दीक पहुँचने तक पुराने दोस्ती के पूरे फायदों का वास्तविक एहसास ही नहीं हुआ था!
अधिकतर तो अपनी ज़िन्दगी में इतने उलझ गये थे कि उनकी कई वर्ष पुरानी 'गोल्डन फ़्रेंडशिप' उनके हाथ से निकल गयी थी। उन्हें 'दोस्ती' को अपेक्षित समय और ज़ोर न देने का गहरा अफ़सोस था। हर कोई मरते वक्त अपने दोस्तों को याद कर रहा था!
5) "काश मैं अपनी इच्छानुसार स्वयं को खुश रख पाता!!!"
आम आश्चर्य की यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात सामने आयी कि कई लोगों को जीवन के अन्त तक यह पता ही नहीं लगता है कि 'ख़ुशी' भी एक choice है!
हमें यह नहीं भूलना चाहिए 
'ख़ुशी वर्तमान पल में है'...
'Happiness Is Now'...
सभी व्यस्त मित्रों को सादर समर्पित

Saturday, 12 August 2017

सबसे पहले अपने लिए जीना सीखिए...


दो खबरों पर जरा नजर डालिए।
1- 12 हजार करोड़ रुपये की मलकियत वाले रेमंड ग्रुप के मालिक विजयपत सिंघानिया पैदल हो गए। बेटे ने पैसे-पैसे के लिए मोहताज कर दिया।
2- करोड़ों रुपये के फ्लैट्स की मालकिन आशा साहनी का मुंबई के उनके फ्लैट में कंकाल मिला। 
विजयपत सिंघानिया और आशा साहनी, दोनों ही अपने बेटों को अपनी दुनिया समझते थे। पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाकर उन्हें अपने से ज्यादा कामयाबी की बुलंदी पर देखना चाहते थे। हर मां, हर पिता की यही इच्छा होती है। विजयपत सिंघानिया ने यही सपना देखा होगा कि उनका बेटा उनकी विरासत संभाले, उनके कारोबार को और भी ऊंचाइयों पर ले जाए। आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया दोनों की इच्छा पूरी हो गई। आशा का बेटा विदेश में आलीशान जिंदगी जीने लगा, सिंघानिया के बेटे गौतम ने उनका कारोबार संभाल लिया, तो फिर कहां चूक गए थे दोनों। क्यों आशा साहनी कंकाल बन गईं, क्यों विजयपत सिंघानिया 78 साल की उम्र में सड़क पर आ गए। मुकेश अंबानी के राजमहल से ऊंचा जेके हाउस बनवाया था, लेकिन अब किराए के फ्लैट में रहने पर मजबूर हैं। तो क्या दोषी सिर्फ उनके बच्चे हैं..?
अब जरा जिंदगी के क्रम पर नजर डालें। बचपन में ढेर सारे नाते रिश्तेदार, ढेर सारे दोस्त, ढेर सारे खेल, खिलौने..। थोड़े बड़े हुए तो पाबंदियां शुरू। जैसे जैसे पढ़ाई आगे बढ़ी, कामयाबी का फितूर, आंखों में ढेर सारे सपने। कामयाबी मिली, सपने पूरे हुए, आलीशान जिंदगी मिली, फिर अपना घर, अपना निजी परिवार। हम दो, हमारा एक, किसी और की एंट्री बैन। दोस्त-नाते रिश्तेदार छूटे। यही तो है शहरी जिंदगी। दो पड़ोसी बरसों से साथ रहते हैं, लेकिन नाम नहीं जानते हैं एक-दूसरे का। क्यों जानें, क्या मतलब है। हम क्यों पूछें..। फिर एक तरह के डायलॉग-हम लोग तो बच्चों के लिए जी रहे हैं।
मेरी नजर में ये दुनिया का सबसे घातक डायलॉग है-'हम तो अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं, बस सब सही रास्ते पर लग जाएं।' अगर ये सही है तो फिर बच्चों के कामयाब होने के बाद आपके जीने की जरूरत क्यों है। यही तो चाहते थे कि बच्चे कामयाब हो जाएं। कहीं ये हिडेन एजेंडा तो नहीं था कि बच्चे कामयाब होंगे तो उनके साथ बुढ़ापे में हम लोग मौज मारेंगे..? अगर नहीं तो फिर आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया को शिकायत कैसी। दोनों के बच्चे कामयाब हैं, दोनों अपने बच्चों के लिए जिए, तो फिर अब उनका काम खत्म हो गया, जीने की जरूरत क्या है।
आपको मेरी बात बुरी लग सकती है, लेकिन ये जिंदगी अनमोल है, सबसे पहले अपने लिए जीना सीखिए। जंगल में हिरन से लेकर भेड़िए तक झुंड बना लेते हैं, लेकिन इंसान क्यों अकेला रहना चाहता है। गरीबी से ज्यादा अकेलापन तो अमीरी देती है। क्यों जवानी के दोस्त बढ़ती उम्र के साथ छूटते जाते हैं। नाते रिश्तेदार सिमटते जाते हैं..। करोड़ों के फ्लैट की मालकिन आशा साहनी के साथ उनकी ननद, भौजाई, जेठ, जेठानी के बच्चे पढ़ सकते थे..? क्यों खुद को अपने बेटे तक सीमित कर लिया। सही उम्र में क्यों नहीं सोचा कि बेटा अगर नालायक निकल गया तो कैसे जिएंगी। जब दम रहेगा, दौलत रहेगी, तब सामाजिक सरोकार टूटे रहेंगे, ऐसे में उम्र थकने पर तो अकेलापन ही हासिल होगा।
इस दुनिया का सबसे बड़ा भय है अकेलापन। व्हाट्सएप, फेसबुक के सहारे जिंदगी नहीं कटने वाली। जीना है तो घर से निकलना होगा, रिश्ते बनाने होंगे। दोस्ती गांठनी होगी। पड़ोसियों से बातचीत करनी होगी। आज के फ्लैट कल्चर वाले महानगरीय जीवन में सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि खुदा न खासता आपकी मौत हो गई तो क्या कंधा देने वाले चार लोगों का इंतजाम आपने कर रखा है..? जिन पड़ोसियों के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा रखा था, जिन्हें कभी आपने घर नहीं बुलाया, वो भला आपको घाट तक पहुंचाने क्यों जाएंगे..?
याद कीजिए दो फिल्मों को। एक अवतार, दूसरी बागबां। अवतार फिल्म में नायक अवतार (राजेश खन्ना) बेटों से बेदखल होकर अगर जिंदगी में दोबारा उठ खड़ा हुआ तो उसके पीछे दो वजहें थीं। एक तो अवतार के दोस्त थे, दूसरे एक वफादार नौकर, जिसे अवतार ने अपने बेटों की तरह पाला था। वक्त पड़ने पर यही लोग काम आए। बागबां के राज मल्होत्रा (अमिताभ बच्चन) बेटों से बेइज्जत हुए, लेकिन दूसरी पारी में बेटों से बड़ी कामयाबी कैसे हासिल की, क्योंकि उन्होंने एक अनाथ बच्चे (सलमान खान) को अपने बेटे की तरह पाला था, उन्हें मोटा भाई कहने वाला दोस्त (परेश रावल) था, नए दौर में नई पीढ़ी से जुड़े रहने की कूव्वत थी। 
विजयपत सिंघानिया के मरने के बाद सब कुछ तो वैसे भी गौतम सिंघानिया का ही होने वाला था, तो फिर क्यों जीते जी सब कुछ बेटे को सौंप दिया..? क्यों संतान की मुहब्बत में ये भूल गए कि इंसान की फितरत किसी भी वक्त बदल सकती है। जो गलती विजयपत सिंघानिया ने की, आशा साहनी ने की, वो आप मत कीजिए। रिश्तों और दोस्ती की बागबानी को सींचते रहिए, ये जिंदगी आपकी है, बच्चों की बजाय पहले खुद के लिए जिंदा रहिए। आप जिंदा रहेंगे, बच्चे जिंदा रहेंगे। अपेक्षा किसी से भी मत कीजिए, क्योंकि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं।

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला

सांपों के देश में एक ऐसा नेवला पैदा हो गया, जो सांप तो क्या, किसी भी जानवर से लड़ना नहीं चाहता था। सभी नेवलों में यह बात फैल गई। आखिरकार एक ...